{"_id":"6740808dda5d4c8c0b02fc5a","slug":"international-lavi-fair-rampur-bushahr-rampur-hp-news-c-178-1-ssml1032-125217-2024-11-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"Rampur Bushahar News: आधुनिकता की चमक के आगे फीकी पड़ने लगी पुरातन संस्कृति","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Rampur Bushahar News: आधुनिकता की चमक के आगे फीकी पड़ने लगी पुरातन संस्कृति
विज्ञापन
वर्ष दर वर्ष घट रही धातुओं और वाद्ययंत्रों की मांग
हर वर्ष कुल्लू, मंडी से पहुंच रहे व्यापारी, लगातार घटती मांग से हो रहे चिंतित
हस्तशिल्प के बेजोड़ नमूनों के भविष्य पर संकट
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। आधुनिकता की चकाचौंध में पुरातन संस्कृति के परिचायक सिमटने की कगार पर हैं। देव संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माने जाने वाले धातुओं और वाद्ययंत्राें की मांग लगातार घटती जा रही है। वर्ष-दर-वर्ष धातुओं और वाद्ययंत्रों की मांग में गिरावट दर्ज की जा रही है। समय के साथ-साथ हस्तशिल्प की बेजोड़ कला सिमटने की कगार पर पहुंच गई है। इसका कारण आधुनिकता भरा दौर और युवा पीढ़ी की घटती रुचि है। रामपुर में सजे अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में हर वर्ष धातुओं और वाद्ययंत्रों का कारोबार घटता जा रहा है।
रामपुर का अंतरराष्ट्रीय लवी मेला सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी संजोए हुए है। एक दौर था जब लवी मेले में कुल्लू और मंडी जिले में बने धातुओं और वाद्ययंत्रों का खूब कारोबार होता था। यह वह दौर था, जब प्रदेश में देव संस्कृति से लोगों का अच्छा-खासा जुड़ाव था। इस दौरान में आयोजित होने वाले लवी मेले में हस्त निर्मित विभिन्न वस्तुओं की खूब खरीद होती थी। करीब 300 वर्षों का इतिहास समेटे इस मेले का स्वरूप लगातार बदलता गया, लेकिन धातुओं की वस्तुओं और वाद्ययंत्रों की मांग बराबर रहती थी। बात करें बीते एक दशक की, तो इस दशक में धातुओं और वाद्ययंत्रों की मांग में खासी गिरावट दर्ज की गई है। मेले में धातुओं से बनी वस्तुओं और वाद्ययंत्रों के कारोबार में करीब 70 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। पहले के मुकाबले आज के दौर में हस्तशिल्प वस्तुओं की खरीद में भारी कमी देखने को मिल रही है। हस्तशिल्प से जुड़े लोग आज भी अपनी कलाओं के बेजोड़ नमूने पेश कर रहे हैं। धातुओं से बनी इन वस्तुओं का इस्तेमाल देवी-देवताओं के मोहरे, मंदिरों के विभिन्न उपयोग, सजावट और कार्यक्रमों में होता है, लेकिन आधुनिकता का दौर हस्तशिल्पकारों के लिए निराशाजनक साबित हो रहा है। नए दौर के युवा भी इन वस्तुओं को खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते, जिसके चलते मांग लगातार घट रही है। लवी मेले में इस वर्ष भी परंपरा का निर्वहन करते हुए मंडी और कुल्लू के शिल्पकारों ने अपने उत्पाद लाए हैं, लेकिन लगातार घट रहे कारोबार से ये लोग खासे चिंतित हैं।
मेले में मंडी, बालीचौकी, कुल्लू और भुंतर से व्यापारी अपने हस्तशिल्प उत्पादों को लेकर हर वर्ष पहुंचते हैं। मंडी जिले से पहुंचे शिल्पकार गोलाराम, बाली चौकी के नोतम राम, बाली कोटी के लोतम सोनी ने कहा कि वे हर वर्ष मेले में दुकानें सजाते हैं। मेले में आते हुए उन्हें करीब 45 साल हो गए हैं। मेले में वे हाथों से बने धातुओं के बर्तन और देव संस्कृति में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं और देवी-देवताओं के मोहरे बेचते हैं। उन्होंने बताया कि समय के साथ साथ इन वस्तुओं की मांग लगातार घटती जा रही है। बीते दस वर्षों में यह मांग करीब 70 प्रतिशत तक घटी है। युवा पीढ़ी भी धातुओं से बनी वस्तुओं की खरीद करने में न के बराबर दिलचस्पी दिखा रहे हैं
विज्ञापन
इस वर्ष मेले में ये हैं धातुओं से बनी वस्तुओं और वाद्ययंत्राें के दाम
इस वर्ष लवी मेले में पूजा में इस्तेमाल होने वाली घंटी पांच सौ रुपये से लेकर 1500 रुपये, करनाल 19 हजार से 35 हजार, घनेरा चार से छह हजार, ढोल 14 हजार से 19 हजार, रणसिंघा 18 से 22 हजार, छत्र 1500 से छह हजार, देवी- देवताओं के मोहरे तीन हजार, अष्टधातु के मोहरे 50 हजार, बुजाल 11 से 14 हजार, कशाढ़ आठ हजार और काउंड़ी नौ हजार रुपये में बिक रही है। हस्तशिल्प से जुड़े लोग वर्षों की परंपरा को कायम रखते हुए हर वर्ष मेले में उत्पाद बेचने पहुंचते हैं, लेकिन लगातार घटती मांग से वे चिंतित हैं।
विज्ञापन
हर वर्ष कुल्लू, मंडी से पहुंच रहे व्यापारी, लगातार घटती मांग से हो रहे चिंतित
हस्तशिल्प के बेजोड़ नमूनों के भविष्य पर संकट
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। आधुनिकता की चकाचौंध में पुरातन संस्कृति के परिचायक सिमटने की कगार पर हैं। देव संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माने जाने वाले धातुओं और वाद्ययंत्राें की मांग लगातार घटती जा रही है। वर्ष-दर-वर्ष धातुओं और वाद्ययंत्रों की मांग में गिरावट दर्ज की जा रही है। समय के साथ-साथ हस्तशिल्प की बेजोड़ कला सिमटने की कगार पर पहुंच गई है। इसका कारण आधुनिकता भरा दौर और युवा पीढ़ी की घटती रुचि है। रामपुर में सजे अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में हर वर्ष धातुओं और वाद्ययंत्रों का कारोबार घटता जा रहा है।
रामपुर का अंतरराष्ट्रीय लवी मेला सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी संजोए हुए है। एक दौर था जब लवी मेले में कुल्लू और मंडी जिले में बने धातुओं और वाद्ययंत्रों का खूब कारोबार होता था। यह वह दौर था, जब प्रदेश में देव संस्कृति से लोगों का अच्छा-खासा जुड़ाव था। इस दौरान में आयोजित होने वाले लवी मेले में हस्त निर्मित विभिन्न वस्तुओं की खूब खरीद होती थी। करीब 300 वर्षों का इतिहास समेटे इस मेले का स्वरूप लगातार बदलता गया, लेकिन धातुओं की वस्तुओं और वाद्ययंत्रों की मांग बराबर रहती थी। बात करें बीते एक दशक की, तो इस दशक में धातुओं और वाद्ययंत्रों की मांग में खासी गिरावट दर्ज की गई है। मेले में धातुओं से बनी वस्तुओं और वाद्ययंत्रों के कारोबार में करीब 70 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। पहले के मुकाबले आज के दौर में हस्तशिल्प वस्तुओं की खरीद में भारी कमी देखने को मिल रही है। हस्तशिल्प से जुड़े लोग आज भी अपनी कलाओं के बेजोड़ नमूने पेश कर रहे हैं। धातुओं से बनी इन वस्तुओं का इस्तेमाल देवी-देवताओं के मोहरे, मंदिरों के विभिन्न उपयोग, सजावट और कार्यक्रमों में होता है, लेकिन आधुनिकता का दौर हस्तशिल्पकारों के लिए निराशाजनक साबित हो रहा है। नए दौर के युवा भी इन वस्तुओं को खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते, जिसके चलते मांग लगातार घट रही है। लवी मेले में इस वर्ष भी परंपरा का निर्वहन करते हुए मंडी और कुल्लू के शिल्पकारों ने अपने उत्पाद लाए हैं, लेकिन लगातार घट रहे कारोबार से ये लोग खासे चिंतित हैं।
विज्ञापन
मेले में मंडी, बालीचौकी, कुल्लू और भुंतर से व्यापारी अपने हस्तशिल्प उत्पादों को लेकर हर वर्ष पहुंचते हैं। मंडी जिले से पहुंचे शिल्पकार गोलाराम, बाली चौकी के नोतम राम, बाली कोटी के लोतम सोनी ने कहा कि वे हर वर्ष मेले में दुकानें सजाते हैं। मेले में आते हुए उन्हें करीब 45 साल हो गए हैं। मेले में वे हाथों से बने धातुओं के बर्तन और देव संस्कृति में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं और देवी-देवताओं के मोहरे बेचते हैं। उन्होंने बताया कि समय के साथ साथ इन वस्तुओं की मांग लगातार घटती जा रही है। बीते दस वर्षों में यह मांग करीब 70 प्रतिशत तक घटी है। युवा पीढ़ी भी धातुओं से बनी वस्तुओं की खरीद करने में न के बराबर दिलचस्पी दिखा रहे हैं
विज्ञापन
इस वर्ष मेले में ये हैं धातुओं से बनी वस्तुओं और वाद्ययंत्राें के दाम
इस वर्ष लवी मेले में पूजा में इस्तेमाल होने वाली घंटी पांच सौ रुपये से लेकर 1500 रुपये, करनाल 19 हजार से 35 हजार, घनेरा चार से छह हजार, ढोल 14 हजार से 19 हजार, रणसिंघा 18 से 22 हजार, छत्र 1500 से छह हजार, देवी- देवताओं के मोहरे तीन हजार, अष्टधातु के मोहरे 50 हजार, बुजाल 11 से 14 हजार, कशाढ़ आठ हजार और काउंड़ी नौ हजार रुपये में बिक रही है। हस्तशिल्प से जुड़े लोग वर्षों की परंपरा को कायम रखते हुए हर वर्ष मेले में उत्पाद बेचने पहुंचते हैं, लेकिन लगातार घटती मांग से वे चिंतित हैं।