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Rampur Bushahar News: देव विदाई के साथ संपन्न हुई धोगी की बूढ़ी दिवाली
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आनी के धोगी में आयोजित बूढ़ी दिवाली मेले में देव मिलन के साक्षी बने हजारों ग्रामीण। संवाद
गढ़पती देवता शमशरी महादेव और टोना नाग का ग्रामीणाें ने प्राप्त किया आशीर्वाद
संवाद न्यूज एजेंसी
आनी(कुल्लू)। आनी खंड की प्राचीन दो दिवसीय धोगी बूढ़ी दिवाली का रविवार को विधिवत संपन्न हो गया। क्षेत्र के आराध्य देव शमशरी महादेव व टोणा नाग के आगमन और मनमोहक नृत्य के बीच दिवाली पर्व की खूब रौनक देखने को मिली ।
क्षेत्र के आराध्य देव शमशरी महादेव हर वर्ष मार्गशीष की कृष्ण अमावस्या को अपने प्राचीन मंदिर धोगी में बूढ़ी दिवाली मनाने पहुंचते हैं, जिससे क्षेत्रवासियों में काफी उत्साह देखने को मिलता है। एक मान्यता अनुसार प्रभु राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापसी पर त्रेता युग का अंत हुआ, परंतु दिवाली सतयुग के अंत में बलिराज के समय से प्रचलित है। इसी अमावस्या से महाभारत का युद्ध शुरू हुआ जो 18 दिनों तक चला था, तभी से दिवाली विभिन्न जगहों पर मनाई जाती है। वहीं कई स्थानों पर इंद्रदेव और वृत्रासुर संग्राम से भी बूढ़ी दिवाली को मनाते हैं। शमशरी महादेव का यहाँ पहुंचने से पहले शमशर,कंडाखमारला, कलौ,शरण, च्वाई और धामनी गांवों में भव्य स्वागत किया गया । आज भी प्राचीन परम्परा अनुसार देवता के रथ को दोनों ओर से रथ में बंधे रस्सों से खींचा जाता है । देवता का आगमन सदियों से उसी रास्ते से होता आया है जहां से देवता पहले यहां अपने मंदिर पहुंचते थे। आज भी यह प्राचीन रस्म बखूबी निभाई जाती है। देर शाम को शमशरी महादेव और टोना नाग अपने देवलुओ संग पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों पर मेला स्थल धोगी पहुंचे जहां देवताओं के मिलन का अनूठा नजारा देखने को मिला था । यहां पहुंचने पर दोनों देवताओं का भव्य स्वागत किया गया था।
प्राचीन रीति-रिवाजों अनुसार रात्रि के समय गांव के सैकड़ों लोग वाद्य यंत्रों की धुनों पर मशाल जलाकर प्राचीन गीत, जतियां गाकर मंदिर की परिक्रमा करके समाज में फैली अंधकार रूपी बुराइयों को प्रकाश रूपी दुर्जय शस्त्र से दूर करने का संदेश देकर सुख शांति की कामना करते है। दिन को पारंपरिक वेश भूषा में एक सुन्दर नाटी का भी आयोजन किया जाता है। वहीं, बगड़ी की घास से बने एक लंबे रस्से के साथ देव-दानव का एक भव्य युद्ध देखने को मिलता हैं। जो समुद्र मंथन की याद दिलाता है। इसमें देवताओं की जीत,अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
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रविवार शाम को गढ़पति शमशरी महादेव और टौणा नाग पारंपरिक ढोल नगाड़ों की थाप और करनालों की धुनों पर श्रद्धालुओं संग संयुक भावनामक नृत्य करके क्षेत्र की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापिस अपने देवालय शमशर लौट गए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
आनी(कुल्लू)। आनी खंड की प्राचीन दो दिवसीय धोगी बूढ़ी दिवाली का रविवार को विधिवत संपन्न हो गया। क्षेत्र के आराध्य देव शमशरी महादेव व टोणा नाग के आगमन और मनमोहक नृत्य के बीच दिवाली पर्व की खूब रौनक देखने को मिली ।
क्षेत्र के आराध्य देव शमशरी महादेव हर वर्ष मार्गशीष की कृष्ण अमावस्या को अपने प्राचीन मंदिर धोगी में बूढ़ी दिवाली मनाने पहुंचते हैं, जिससे क्षेत्रवासियों में काफी उत्साह देखने को मिलता है। एक मान्यता अनुसार प्रभु राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापसी पर त्रेता युग का अंत हुआ, परंतु दिवाली सतयुग के अंत में बलिराज के समय से प्रचलित है। इसी अमावस्या से महाभारत का युद्ध शुरू हुआ जो 18 दिनों तक चला था, तभी से दिवाली विभिन्न जगहों पर मनाई जाती है। वहीं कई स्थानों पर इंद्रदेव और वृत्रासुर संग्राम से भी बूढ़ी दिवाली को मनाते हैं। शमशरी महादेव का यहाँ पहुंचने से पहले शमशर,कंडाखमारला, कलौ,शरण, च्वाई और धामनी गांवों में भव्य स्वागत किया गया । आज भी प्राचीन परम्परा अनुसार देवता के रथ को दोनों ओर से रथ में बंधे रस्सों से खींचा जाता है । देवता का आगमन सदियों से उसी रास्ते से होता आया है जहां से देवता पहले यहां अपने मंदिर पहुंचते थे। आज भी यह प्राचीन रस्म बखूबी निभाई जाती है। देर शाम को शमशरी महादेव और टोना नाग अपने देवलुओ संग पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों पर मेला स्थल धोगी पहुंचे जहां देवताओं के मिलन का अनूठा नजारा देखने को मिला था । यहां पहुंचने पर दोनों देवताओं का भव्य स्वागत किया गया था।
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प्राचीन रीति-रिवाजों अनुसार रात्रि के समय गांव के सैकड़ों लोग वाद्य यंत्रों की धुनों पर मशाल जलाकर प्राचीन गीत, जतियां गाकर मंदिर की परिक्रमा करके समाज में फैली अंधकार रूपी बुराइयों को प्रकाश रूपी दुर्जय शस्त्र से दूर करने का संदेश देकर सुख शांति की कामना करते है। दिन को पारंपरिक वेश भूषा में एक सुन्दर नाटी का भी आयोजन किया जाता है। वहीं, बगड़ी की घास से बने एक लंबे रस्से के साथ देव-दानव का एक भव्य युद्ध देखने को मिलता हैं। जो समुद्र मंथन की याद दिलाता है। इसमें देवताओं की जीत,अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
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रविवार शाम को गढ़पति शमशरी महादेव और टौणा नाग पारंपरिक ढोल नगाड़ों की थाप और करनालों की धुनों पर श्रद्धालुओं संग संयुक भावनामक नृत्य करके क्षेत्र की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापिस अपने देवालय शमशर लौट गए।