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Rampur Bushahar News: गर्मी बढ़ते ही सेब के बगीचों में ड्रापिंग शुरू, कम फसल से बढ़ी चिंता
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आने वाले दिनों में तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो उत्पादन पर पड़ेगा बड़ा असर
पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स पूरी न होने का असर भी फल पर पड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। ऊपरी शिमला समेत रोहड़ू, जुब्बल, कोटखाई और चिड़गांव क्षेत्र के सेब बगीचों में तापमान बढ़ने के साथ ही फलों की ड्रापिंग शुरू हो गई है। इस वर्ष पहले ही मौसम के बदलाव के कारण पिछले साल की तुलना में सेब के पेड़ों पर कम फल लगे हैं। अब मई में हो रही अत्यधिक ड्रापिंग ने बागवानों की चिंता और बढ़ा दी है। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सेब में मई-जून के दौरान सीमित मात्रा में फल गिरना एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, जिसे नेचुरल फ्रूट ड्रॉप कहा जाता है। पेड़ अपनी क्षमता के अनुसार अतिरिक्त फलों को स्वयं गिरा देता है, ताकि शेष फल बेहतर आकार और गुणवत्ता के साथ विकसित हो सकें। इस बार अत्यधिक गर्मी, नमी की कमी और मौसम में लगातार बदलाव के कारण ड्रापिंग सामान्य से अधिक देखी जा रही है। बागवानी वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान बढ़ने पर पेड़ों में नमी की कमी हो जाती है, जिससे पौधों पर तनाव बढ़ता है और फल झड़ने लगते हैं। इसके अलावा परागण के समय खराब मौसम, फूलों के दौरान बारिश, तेज हवाएं, ओलावृष्टि और पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स पूरी न होने का असर भी फल पर पड़ा है। कई क्षेत्रों में इस बार फूल तो आए, लेकिन फल सेटिंग कमजोर रही। विशेषज्ञों के अनुसार, पोषक तत्वों की कमी, अनियमित सिंचाई, रोग और कीट का प्रकोप भी ड्रापिंग बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं। यदि पेड़ों को समय पर कैल्शियम, बोरॉन और अन्य सूक्ष्म तत्व नहीं मिलते हैं, तो छोटे फल तेजी से गिरने लगते हैं। वहीं, लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक अधिक पानी मिलने से भी फल झड़ने की समस्या बढ़ जाती है।
नमी बनाए रखने के लिए नियमित सिंचाई करें
बागवानी विशेषज्ञ एवं कृषि विज्ञान केंद्र की प्रभारी डाॅ. उषा शर्मा ने बागवानों को सलाह दी है कि बगीचों में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें, नियमित सिंचाई करें और संतुलित मात्रा में खाद व सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग करें। अत्यधिक गर्मी के दौरान रात में हल्की सिंचाई और पौधों पर एंटी-स्ट्रेस स्प्रे भी लाभकारी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम के बदलते स्वरूप को देखते हुए बागवानों को आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाना होगा, तभी उत्पादन में गिरावट को रोका जा सकेगा।
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पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स पूरी न होने का असर भी फल पर पड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। ऊपरी शिमला समेत रोहड़ू, जुब्बल, कोटखाई और चिड़गांव क्षेत्र के सेब बगीचों में तापमान बढ़ने के साथ ही फलों की ड्रापिंग शुरू हो गई है। इस वर्ष पहले ही मौसम के बदलाव के कारण पिछले साल की तुलना में सेब के पेड़ों पर कम फल लगे हैं। अब मई में हो रही अत्यधिक ड्रापिंग ने बागवानों की चिंता और बढ़ा दी है। बागवानों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सेब में मई-जून के दौरान सीमित मात्रा में फल गिरना एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, जिसे नेचुरल फ्रूट ड्रॉप कहा जाता है। पेड़ अपनी क्षमता के अनुसार अतिरिक्त फलों को स्वयं गिरा देता है, ताकि शेष फल बेहतर आकार और गुणवत्ता के साथ विकसित हो सकें। इस बार अत्यधिक गर्मी, नमी की कमी और मौसम में लगातार बदलाव के कारण ड्रापिंग सामान्य से अधिक देखी जा रही है। बागवानी वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान बढ़ने पर पेड़ों में नमी की कमी हो जाती है, जिससे पौधों पर तनाव बढ़ता है और फल झड़ने लगते हैं। इसके अलावा परागण के समय खराब मौसम, फूलों के दौरान बारिश, तेज हवाएं, ओलावृष्टि और पर्याप्त चिलिंग ऑवर्स पूरी न होने का असर भी फल पर पड़ा है। कई क्षेत्रों में इस बार फूल तो आए, लेकिन फल सेटिंग कमजोर रही। विशेषज्ञों के अनुसार, पोषक तत्वों की कमी, अनियमित सिंचाई, रोग और कीट का प्रकोप भी ड्रापिंग बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं। यदि पेड़ों को समय पर कैल्शियम, बोरॉन और अन्य सूक्ष्म तत्व नहीं मिलते हैं, तो छोटे फल तेजी से गिरने लगते हैं। वहीं, लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक अधिक पानी मिलने से भी फल झड़ने की समस्या बढ़ जाती है।
नमी बनाए रखने के लिए नियमित सिंचाई करें
बागवानी विशेषज्ञ एवं कृषि विज्ञान केंद्र की प्रभारी डाॅ. उषा शर्मा ने बागवानों को सलाह दी है कि बगीचों में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें, नियमित सिंचाई करें और संतुलित मात्रा में खाद व सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग करें। अत्यधिक गर्मी के दौरान रात में हल्की सिंचाई और पौधों पर एंटी-स्ट्रेस स्प्रे भी लाभकारी हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम के बदलते स्वरूप को देखते हुए बागवानों को आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाना होगा, तभी उत्पादन में गिरावट को रोका जा सकेगा।
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