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वाद्य यंत्रों की थाप पर मेला मैदान पहुंचे देवी-देवता
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अमर उजाला ब्यूरो
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नोगली (रामपुर बुशहर)। शलाटी वैली के ऐतिहासिक शाड़ की जातर (आषाढ़ मेला) में वाद्ययंत्रों की थाप पर देवता साहिब मेला मैदान पहुंचे। बुधवार को देवी-देवताओं के आगमन के साथ नोगली में तीन दिवसीय मेले का शुभारंभ हुआ। आगामी तीन दिनों तक ढोल नगाड़ों की थाप पर देवलु और ग्रामीण खूब झूमेंगे। तीन दिवसीय इस मेले में मेजबान लक्ष्मी नारायण देवता साहिब, देवता साहिब शिंगला, देवता साहिब शनेरी, देवता साहिब दमुख डंसा और देवता साहिब कशोली ने शिरकत की।
शलाटी वैली की ऐतिहासिक शाड़ की जातर मेले में भड़ावली पंचायत के लक्ष्मी नारायण देवता इससे पूर्व अपने विभिन्न गांव का भ्रमण करते हैं। हर गांव में उनका पारंपरिक तरीके से भव्य स्वागत किया जाता है। देवता साहिब लक्ष्मी नारायण अपने मंदिर कुमसू से खखरोला, राजपुरा, मसारना, करेरी, कमलाऊ, छलावट और भड़ावली गांव का दौरा करते हैं। मसारना गांव से शाड़ की जातर का दौर शुरू हुआ। वहीं छलावट, कमलाऊ और भड़ावली गांव में दिनभर नाटियों का दौर चला। बुधवार सुबह लक्ष्मी नारायण देवता अपने मंदिर कुमसू पहुंचे और दोपहर बाद मंदिर परिसर से सजधज कर नोगली मेला मैदान पहुंचे।
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नोगली मेले में लक्ष्मी नारायण देवता साहिब और अन्य देवी देवताओं का मंदिर कमेटी ने गर्मजोशी से स्वागत किया। सभी देवी-देवता अपने देवलुओं संग मेला मैदान नाचते-गाते पहुंचे। दोपहर बाद मेला मैदान में काफी लोग उमड़े। महिलाओं में अपने ईष्ट देव के दर्शन करने के लिए खासा उत्साह दिखा। अपने क्षेत्र से दूर दराज ब्याही बेटियों के लिए इस मेले में अपने देवता के दर्शन और अपनों से मिलने का एक विशेष मौका मिलता है।
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नोगली के देव मेहता, राणा तारा सिंह, टिक्कम सेनी, जगत वर्मा, हर्ष कायथ, रमेश मेहता, चेतराम मेहता, लवली चौहान और हैप्पी के अनुसार उन्हें ऐतिहासिक मेले का काफी बेसब्री से इंतजार रहता है। आधुनिकता के दौर में भी यह ऐतिहासिक मेला वर्षों पुरानी परंपरा को संजोए हुए है।
चुल्ली और खुमानी से धोए जाते हैं देवता लक्ष्मी नारायण के मुहरे
इतिहास गवाह है कि देवता साहिब लक्ष्मी नारायण साल में दो बार इलाके के प्रवास पर रहते हैं। हर वर्ष शाड़ की जातर के दौरान देवता के मुहरों को स्नान करवाया जाता है। छलावट के चिरला क्षेत्र में कायथ परिवार से संबंध रखने वाले परिवारों के यहां देवता साहिब ठहरते हैं और देवलु यहां पर हर साल सुखाई गई चुल्ली और खुमानी से इन मुहरों को चमकाते हैं। उसके बाद देवता लक्ष्मी नारायण नए परिधानों में सजधज कर दूसरे गांवों की ओर प्रस्थान करते हैं।