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Mandi News: त्रिलोकीनाथ मंदिर में सजा देव समाज का पारंपरिक न्याय मंच
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मंडी में अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्र महोत्सव पर बुरी शाक्तियों को भगाते देव आदि ब्रह्मा के देवल
मंडी। शहर के त्रिलोकीनाथ मंदिर में चौहारघाटी के देवताओं का हारका आयोजित किया गया। देव परंपराओं के अनुसार हारका में देवी-देवताओं से संबंधी विभिन्न कई मामलों को लेकर चर्चा की गई। सभी देवी-देवताओं के गूर, पुजारी, देवता कमेटियों के प्रधान, करदार, डुमच तथा देव समाज से जुड़े लोगों ने पारंपरिक हारका में भाग लिया। यह आयोजन हर वर्ष मेले के बीच आयोजित किया जाता है, जिसमें घाटी के आराध्य देवता हुरंग नारायण की उपस्थिति में समस्त देव समाज एकत्रित होता है।
देव संस्कृति के अनुसार विवादित, रोगदोष, बारिश, धूप, पानी, बीमारियों के निवारण को हारका कहते हैं। इस प्रक्रिया में चावल के दाने (छोदा) और जंगली धूप के सूखे फूल, जिन्हें भंवरू कहा जाता है, देवता की विशेष धातु की थाली में अर्पित किए जाते हैं। धूप जलाकर ‘धनग्यारा’ और घंटी के साथ मंत्रोच्चारण किया जाता है। सबसे पहले देवताओं के गूर पूजा करते हैं। तत्पश्चात देवी माताओं के गूर उसी विधि को दोहराते हैं। इसके बाद देव समाज में घटित घटनाओं और विवादों पर देव नीति के अनुसार निर्णय लिया जाता है, जिसे वहीं सार्वजनिक रूप से सुनाया जाता है।
देव समाज में हारका को एक प्रकार का पारंपरिक न्याय मंच भी माना जाता है। जिस प्रकार समाज के अन्य वर्गों में विवादों का निपटारा पुलिस थाने और न्यायालय में होता है, उसी प्रकार देव समाज में देवी-देवताओं के समक्ष रखे गए मामलों का निर्णय सर्वमान्य माना जाता है। देवता की ओर से दिया गया फैसला अंतिम और सभी के लिए स्वीकार्य होता है। संवाद
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देव संस्कृति के अनुसार विवादित, रोगदोष, बारिश, धूप, पानी, बीमारियों के निवारण को हारका कहते हैं। इस प्रक्रिया में चावल के दाने (छोदा) और जंगली धूप के सूखे फूल, जिन्हें भंवरू कहा जाता है, देवता की विशेष धातु की थाली में अर्पित किए जाते हैं। धूप जलाकर ‘धनग्यारा’ और घंटी के साथ मंत्रोच्चारण किया जाता है। सबसे पहले देवताओं के गूर पूजा करते हैं। तत्पश्चात देवी माताओं के गूर उसी विधि को दोहराते हैं। इसके बाद देव समाज में घटित घटनाओं और विवादों पर देव नीति के अनुसार निर्णय लिया जाता है, जिसे वहीं सार्वजनिक रूप से सुनाया जाता है।
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देव समाज में हारका को एक प्रकार का पारंपरिक न्याय मंच भी माना जाता है। जिस प्रकार समाज के अन्य वर्गों में विवादों का निपटारा पुलिस थाने और न्यायालय में होता है, उसी प्रकार देव समाज में देवी-देवताओं के समक्ष रखे गए मामलों का निर्णय सर्वमान्य माना जाता है। देवता की ओर से दिया गया फैसला अंतिम और सभी के लिए स्वीकार्य होता है। संवाद
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