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फोरलेन प्रभावितों के हकों के लिए समिति ने किया धरना-प्रदर्शन
Updated Mon, 15 Oct 2018 11:09 PM IST
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मंडी। शिमला में 13 अक्तूबर को आयोजित उच्च स्तरीय बैठक में आश्वासन मिलने के बाद भी फोरलेन संघर्ष समिति ने भूख हड़ताल को स्थगित कर धरना प्रदर्शन किया। सोमवार को मंडी में मांगों को लेकर हुए धरने प्रदर्शन में काफी संख्या में फोरलेन प्रभावित जुटे। पड्डल मैदान में एकत्रित होकर रैली के रूप में सेरी मंच होते हुए उपायुक्त कार्यालय पहुंचे। यहां खूब नारेबाजी की और नेशनल हाईवे अथारिटी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। समिति के अध्यक्ष ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर ने कहा कि फोरलेन प्रभावितों के साथ अन्याय किया जा रहा है। मांग रखी कि गांवों को टीसीपी से बाहर किया जाए। अधिग्रहण 2013 को लागू कर सरकार प्रभावितों को चार गुना मुआवजा दे और पुनर्स्थापन, पुनर्वास के लिए भी कदम उठाए जाएं। संघर्ष समिति ने मांगों का ज्ञापन उपायुक्त ऋग्वेद ठाकुर के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजा।
कहा कि भू-अधिग्रहण कानून 2013 में निहित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया। इसमें भूमिहीनों को भूमि, बेघरों को घर, बेरोजगारों को रोजगार अथवा 5 लाख की राशि का प्रावधान है। वहीं निर्भर किरायेदार, हस्तशिल्पी, कामगार व बर्तनदार के अलावा अन्य प्रकार से लाभार्थी हैं, के लिए भी कानून में पुनर्वास और पुनर्स्थापना की व्यवस्था है।
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पुरानी दरों पर किया जा रहा संपत्ति का आकलन
पीडब्ल्यूडी मकानों का मुआवजा 2014 की दरों पर तय कर रहा है। इससे प्रभावितों को भारी हानि हो रही है। कुल्लू जिले के सभी मुहालों और मंडी जिले के कुछ क्षेत्रों में मकानों के अवार्ड में 12 प्रतिशत के हिसाब से ब्याज दिया गया है। अब अवार्ड्स में ब्याज देना बंद कर दिया है। इससे करोड़ों की चपत लग रही है। पेड़-पौधों और अन्य फसलों के मूल्यांकन में प्रयुक्त किया जाने वाला फार्मूला पूरी तरह से अप्रासंगिक है। मूल्यांकन में 1979 में बनाया गया हरबंस सिंह फार्मूला प्रयुक्त किया जा रहा। 39 सालों में बागवानी के तरीके, पेड़-पौधों की प्रजातियों व किस्मों तथा कीमतों में भारी बदलाव आया है।
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ग्रामीण क्षेत्रों को टीसीपी से बाहर किया जाए
पूर्व सरकार ने अव्यावहारिक रूप से लगभग पूरे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में टीसीपी लागू किया है। इन अधिसूचनाओं के समय जनता को विश्वास में नहीं लिया गया। पंचायत प्रतिनिधियों को भी गुमराह किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब जनता के पास भूमि के बहुत ही छोटे-छोटे टुकड़े हैं। जिन पर घर आदि बने हैं, अथवा बनाए जाने हैं। ऐसे में फोरलेन की मार के बाद टीसीपी के कड़े प्रावधानों से प्रभावितों की हालत पतली हो गई है।
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यह मांगें
-5 मीटर कंट्रोल विड्थ में सरकार दे जनता को राहत
-आपसी विवादों के निपटारे के लिए समिति का हो गठन
-1 जनवरी 2015 के बाद की प्रक्रिया पर फैक्टर दो लागू हो
-पुनर्स्थापन व पुनर्वास की शेड्यूल 2 की प्रक्रिया पर तुरंत हो अमल
-मकानों आदि में मुआवजा वर्तमान दरों पर निर्धारित हो
-प्रदेश स्तरीय मार्केट वैल्यू डिटर्मीनेशन कमेटी गठित हो
-भू अर्जन अधिकारी, प्रशासन, एनएचएआई व प्रभावितों की बने समन्वय समिति
-एमएलए, सचिवों, जिलाधीशों व प्रभावितों की बने मॉनीटरिंग कमेटी
-उजड़ रहे कस्बों को शेड्यूल 3 के अंतर्गत पुन: बसाया जाए
-प्रभावित रास्ते, कूहलें, नालियां कुएं, बिजली व पाइपलाइनों की हो बहाली
-भू-अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार प्रभावितों को मिले रोजगार
-निर्माण में घरों, खेतों को हो रहे नुकसान के लिए बने मुआवजा नीति
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कहा कि भू-अधिग्रहण कानून 2013 में निहित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया। इसमें भूमिहीनों को भूमि, बेघरों को घर, बेरोजगारों को रोजगार अथवा 5 लाख की राशि का प्रावधान है। वहीं निर्भर किरायेदार, हस्तशिल्पी, कामगार व बर्तनदार के अलावा अन्य प्रकार से लाभार्थी हैं, के लिए भी कानून में पुनर्वास और पुनर्स्थापना की व्यवस्था है।
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पुरानी दरों पर किया जा रहा संपत्ति का आकलन
पीडब्ल्यूडी मकानों का मुआवजा 2014 की दरों पर तय कर रहा है। इससे प्रभावितों को भारी हानि हो रही है। कुल्लू जिले के सभी मुहालों और मंडी जिले के कुछ क्षेत्रों में मकानों के अवार्ड में 12 प्रतिशत के हिसाब से ब्याज दिया गया है। अब अवार्ड्स में ब्याज देना बंद कर दिया है। इससे करोड़ों की चपत लग रही है। पेड़-पौधों और अन्य फसलों के मूल्यांकन में प्रयुक्त किया जाने वाला फार्मूला पूरी तरह से अप्रासंगिक है। मूल्यांकन में 1979 में बनाया गया हरबंस सिंह फार्मूला प्रयुक्त किया जा रहा। 39 सालों में बागवानी के तरीके, पेड़-पौधों की प्रजातियों व किस्मों तथा कीमतों में भारी बदलाव आया है।
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ग्रामीण क्षेत्रों को टीसीपी से बाहर किया जाए
पूर्व सरकार ने अव्यावहारिक रूप से लगभग पूरे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में टीसीपी लागू किया है। इन अधिसूचनाओं के समय जनता को विश्वास में नहीं लिया गया। पंचायत प्रतिनिधियों को भी गुमराह किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब जनता के पास भूमि के बहुत ही छोटे-छोटे टुकड़े हैं। जिन पर घर आदि बने हैं, अथवा बनाए जाने हैं। ऐसे में फोरलेन की मार के बाद टीसीपी के कड़े प्रावधानों से प्रभावितों की हालत पतली हो गई है।
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यह मांगें
-5 मीटर कंट्रोल विड्थ में सरकार दे जनता को राहत
-आपसी विवादों के निपटारे के लिए समिति का हो गठन
-1 जनवरी 2015 के बाद की प्रक्रिया पर फैक्टर दो लागू हो
-पुनर्स्थापन व पुनर्वास की शेड्यूल 2 की प्रक्रिया पर तुरंत हो अमल
-मकानों आदि में मुआवजा वर्तमान दरों पर निर्धारित हो
-प्रदेश स्तरीय मार्केट वैल्यू डिटर्मीनेशन कमेटी गठित हो
-भू अर्जन अधिकारी, प्रशासन, एनएचएआई व प्रभावितों की बने समन्वय समिति
-एमएलए, सचिवों, जिलाधीशों व प्रभावितों की बने मॉनीटरिंग कमेटी
-उजड़ रहे कस्बों को शेड्यूल 3 के अंतर्गत पुन: बसाया जाए
-प्रभावित रास्ते, कूहलें, नालियां कुएं, बिजली व पाइपलाइनों की हो बहाली
-भू-अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार प्रभावितों को मिले रोजगार
-निर्माण में घरों, खेतों को हो रहे नुकसान के लिए बने मुआवजा नीति