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मंडी का नाम बदलने के खिलाफ उतरा भगत मंच
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मंडी। मंडी नगर का नाम बदलने के खिलाफ मंडी की संस्था शहीद भगत सिंह विचार मंच सामने आई है। संस्था ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को उपायुक्त के माध्यम से नाम बदलने से पहले एक बार फिर विचार करने के लिए ज्ञापन प्रेषित किया है। ज्ञापन में कहा गया कि मंडी का नाम मांडव नगर या कुछ और रखने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। मंडी के इतिहास पर आधारित पुस्तकों के अनुसार मंडी प्राचीन नाम है, जबकि मांडव्य नगर का कहीं पर भी उल्लेख नहीं मिलता है। नाम बदलने से भारी परेशानी होगी। मंच के मुताबिक इतिहास की पुस्तक में मांडव नाम का जिक्र नहीं है। इससे स्पष्ट है कि कभी भी मंडी का नाम मांडव नहीं रहा है। नाम बदलने से लोगों को विभिन्न दस्तावेजों में दुरुस्ती करवाने के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ेगा। उनका खर्चा भी होगा।
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यह रहे मौजूद
मंच के संयोजक समीर कश्यप, जिप सदस्य संत राम, सुशील चौहान, पंकज शर्मा, बीआर जसवाल, मनीष कटोच, खेम राज, गंगेश, तरुण दीप, आरएल वर्मा, विजय ठाकुर, दुर्गा दास, अखिलेश ठाकुर, रूपेश, वीरेंद्र कुमार, अश्वनी राणा, हुक्म चंद, अंकुश वालिया, अशोक राणा, नवीन राणा, कमल सैनी, चिरंजी ठाकुर, डिंपल कुमार, उत्तम सिंह, गीतांजलि शर्मा, भीम सिंह, रवि सिंह राणा, प्रवीण कपूर, देश राज शर्मा, लाल सिंह, उमेश, सुरेश सरवाल, चेतन कुमार, सतीश कुमार शर्मा, यश पाल शर्मा और कृष्ण कुमार की ओर से हस्ताक्षरित ज्ञापन उपायुक्त मंडी के माध्यम से मुख्यमंत्री को प्रेषित किया गया है।
इन पुस्तकों में मंडी नाम का ही जिक्र
मंडी नाम रियासत कालीन मंडी से चला हुआ है। मंडी की रियासत के इतिहास की तीन मुख्य पुस्तकें पंजाब गजेटियरस मंडी स्टेट 1920, हिस्ट्री ऑफ पंजाब हिल स्टेट्स 1933 और हिस्ट्री ऑफ मंडी स्टेट 1935 हैं। इनमें से पंजाब गजेटियर के अनुसार मंडी रियासत का नाम अन्य पहाड़ी रियासतों की तरह उनकी राजधानियों के नाम पर पड़ा था। मंडी एक हिंदी शब्द है, जिसका मतलब है मार्केट और यह भी संभव है कि यह संस्कृत शब्द मंडपिका से जुड़ा हो, जिसका अर्थ होता है एक खुला हाल या शेड और यह संस्कृत के मांड शब्द से भी लिया हो सकता है जिसका अर्थ होता है सजाना या बांटना। मंच का कहना है कि मंडी के इतिहास के मुताबिक पुराने जमाने से यह स्थान होशियारपुर और मैदानी क्षेत्रों से यारकंद और लद्दाख को जाने वाले मुख्य मार्ग का एक व्यापारिक केंद्र था। मंडी के बारे में पहला संदर्भ पुरानी मंडी के त्रिलोकीनाथ मंदिर में उकृत है, जो 1520 ई. का है। तिब्बतियों में मंडी जाहोर के नाम से जानी जाती है। गुरु गोबिंद सिंह ने भी मंडी शब्द का प्रयोग करते हुए कहा है कि मंडी को जब लूटेंगे, आसमानी गोले छूटेंगे।
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यह रहे मौजूद
मंच के संयोजक समीर कश्यप, जिप सदस्य संत राम, सुशील चौहान, पंकज शर्मा, बीआर जसवाल, मनीष कटोच, खेम राज, गंगेश, तरुण दीप, आरएल वर्मा, विजय ठाकुर, दुर्गा दास, अखिलेश ठाकुर, रूपेश, वीरेंद्र कुमार, अश्वनी राणा, हुक्म चंद, अंकुश वालिया, अशोक राणा, नवीन राणा, कमल सैनी, चिरंजी ठाकुर, डिंपल कुमार, उत्तम सिंह, गीतांजलि शर्मा, भीम सिंह, रवि सिंह राणा, प्रवीण कपूर, देश राज शर्मा, लाल सिंह, उमेश, सुरेश सरवाल, चेतन कुमार, सतीश कुमार शर्मा, यश पाल शर्मा और कृष्ण कुमार की ओर से हस्ताक्षरित ज्ञापन उपायुक्त मंडी के माध्यम से मुख्यमंत्री को प्रेषित किया गया है।
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इन पुस्तकों में मंडी नाम का ही जिक्र
मंडी नाम रियासत कालीन मंडी से चला हुआ है। मंडी की रियासत के इतिहास की तीन मुख्य पुस्तकें पंजाब गजेटियरस मंडी स्टेट 1920, हिस्ट्री ऑफ पंजाब हिल स्टेट्स 1933 और हिस्ट्री ऑफ मंडी स्टेट 1935 हैं। इनमें से पंजाब गजेटियर के अनुसार मंडी रियासत का नाम अन्य पहाड़ी रियासतों की तरह उनकी राजधानियों के नाम पर पड़ा था। मंडी एक हिंदी शब्द है, जिसका मतलब है मार्केट और यह भी संभव है कि यह संस्कृत शब्द मंडपिका से जुड़ा हो, जिसका अर्थ होता है एक खुला हाल या शेड और यह संस्कृत के मांड शब्द से भी लिया हो सकता है जिसका अर्थ होता है सजाना या बांटना। मंच का कहना है कि मंडी के इतिहास के मुताबिक पुराने जमाने से यह स्थान होशियारपुर और मैदानी क्षेत्रों से यारकंद और लद्दाख को जाने वाले मुख्य मार्ग का एक व्यापारिक केंद्र था। मंडी के बारे में पहला संदर्भ पुरानी मंडी के त्रिलोकीनाथ मंदिर में उकृत है, जो 1520 ई. का है। तिब्बतियों में मंडी जाहोर के नाम से जानी जाती है। गुरु गोबिंद सिंह ने भी मंडी शब्द का प्रयोग करते हुए कहा है कि मंडी को जब लूटेंगे, आसमानी गोले छूटेंगे।
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