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Kullu News: दूसरी पारी खेलने के मूड में कई पूर्व पंचायत प्रतिनिधि
Sat, 07 Feb 2026 10:34 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Sat, 07 Feb 2026 10:34 PM IST
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पंचायत चुनाव को लेकर अदालतों से ज्यादा गांव की चौपालों में गर्माहट
संजय ठाकुर
पतलीकूहल (कुल्लू)। पंचायत चुनाव को लेकर प्रदेश की राजनीति इन दिनों अदालतों से ज्यादा गांव की चौपालों में गर्म है।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार भले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी हो लेकिन 31 जनवरी को पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी सियासी हलचल थमी नहीं है, बल्कि और तेज हो गई है। कई पूर्व प्रतिनिधियों को उम्मीद थी कि चुनाव टलने की स्थिति में उन्हें ही अस्थायी राहत मिल जाएगी और वे तब तक कुर्सी संभाले रखेंगे लेकिन सरकार की ओर से ऐसा कोई साफ संकेत नहीं मिला।
इधर, आगामी पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा सस्पेंस आरक्षण रोस्टर को लेकर बना हुआ है। यह अभी तक जारी नहीं हुआ लेकिन राजनीति रुकने का नाम नहीं ले रही। कार्यकाल समाप्त होते ही कुछ पूर्व प्रधानों, उपप्रधानों और सदस्यों ने दूसरी पारी की तैयारी शुरू कर दी है। समर्थकों के साथ बंद कमरों में बैठकें हो रही हैं। रणनीति बन रही है और हर स्थिति से निपटने के लिए प्लान तैयार किए जा रहे हैं।
ग्रामीण राजनीति के जानकारों की मानें तो इस बार चुनाव प्लान-ए, प्लान-बी और प्लान-सी के सहारे लड़ा जाएगा। जैसे ही रोस्टर जारी होगा, उसी पल तय होगा कि कौन मैदान में उतरेगा और कौन कवरिंग कैंडिडेट बनेगा। यानी एक सीट, तीन चेहरे तैयार।
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इस बीच महिलाओं और युवाओं की दावेदारी ने सियासत को नया मोड़ दे दिया है। गांवों में चौक चौराहों से लेकर चाय की दुकानों तक सिर्फ एक ही सवाल रोस्टर कब आएगा और कैसा आएगा?
पूर्व प्रधानों और सदस्यों की वापसी की सुगबुगाहट भी तेज है। राजनीतिक दल पंचायत स्तर पर अपने पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने में जुट गए हैं। सोशल मीडिया पर भी पंचायत चुनाव को लेकर पोस्ट, स्टेटस और व्हाट्सएप ने चर्चाओं ने माहौल बना दिया है।
ग्रामीण मतदाता अब सरकार और अदालत दोनों की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। फैसला चाहे जो भी हो, इतना तय है कि इस बार पंचायत चुनाव सिर्फ स्थानीय विकास नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा राजनीति की दिशा तय करने वाली रिहर्सल बनते नजर आ रहे हैं।
खास तौर पर मनाली विधानसभा क्षेत्र में पंचायत चुनाव को सियासी अग्निपरीक्षा माना जा रहा है, जहां से उभरने वाले परिणाम भविष्य के बड़े राजनीतिक संकेत दे सकते हैं।
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संजय ठाकुर
पतलीकूहल (कुल्लू)। पंचायत चुनाव को लेकर प्रदेश की राजनीति इन दिनों अदालतों से ज्यादा गांव की चौपालों में गर्म है।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार भले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी हो लेकिन 31 जनवरी को पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी सियासी हलचल थमी नहीं है, बल्कि और तेज हो गई है। कई पूर्व प्रतिनिधियों को उम्मीद थी कि चुनाव टलने की स्थिति में उन्हें ही अस्थायी राहत मिल जाएगी और वे तब तक कुर्सी संभाले रखेंगे लेकिन सरकार की ओर से ऐसा कोई साफ संकेत नहीं मिला।
इधर, आगामी पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा सस्पेंस आरक्षण रोस्टर को लेकर बना हुआ है। यह अभी तक जारी नहीं हुआ लेकिन राजनीति रुकने का नाम नहीं ले रही। कार्यकाल समाप्त होते ही कुछ पूर्व प्रधानों, उपप्रधानों और सदस्यों ने दूसरी पारी की तैयारी शुरू कर दी है। समर्थकों के साथ बंद कमरों में बैठकें हो रही हैं। रणनीति बन रही है और हर स्थिति से निपटने के लिए प्लान तैयार किए जा रहे हैं।
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ग्रामीण राजनीति के जानकारों की मानें तो इस बार चुनाव प्लान-ए, प्लान-बी और प्लान-सी के सहारे लड़ा जाएगा। जैसे ही रोस्टर जारी होगा, उसी पल तय होगा कि कौन मैदान में उतरेगा और कौन कवरिंग कैंडिडेट बनेगा। यानी एक सीट, तीन चेहरे तैयार।
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इस बीच महिलाओं और युवाओं की दावेदारी ने सियासत को नया मोड़ दे दिया है। गांवों में चौक चौराहों से लेकर चाय की दुकानों तक सिर्फ एक ही सवाल रोस्टर कब आएगा और कैसा आएगा?
पूर्व प्रधानों और सदस्यों की वापसी की सुगबुगाहट भी तेज है। राजनीतिक दल पंचायत स्तर पर अपने पुराने नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने में जुट गए हैं। सोशल मीडिया पर भी पंचायत चुनाव को लेकर पोस्ट, स्टेटस और व्हाट्सएप ने चर्चाओं ने माहौल बना दिया है।
ग्रामीण मतदाता अब सरकार और अदालत दोनों की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। फैसला चाहे जो भी हो, इतना तय है कि इस बार पंचायत चुनाव सिर्फ स्थानीय विकास नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा राजनीति की दिशा तय करने वाली रिहर्सल बनते नजर आ रहे हैं।
खास तौर पर मनाली विधानसभा क्षेत्र में पंचायत चुनाव को सियासी अग्निपरीक्षा माना जा रहा है, जहां से उभरने वाले परिणाम भविष्य के बड़े राजनीतिक संकेत दे सकते हैं।