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एक बार फिर टिकट पाने से पिछड़े महेश्वर
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कुल्लू/खराहल। कद्दावर नेता महेश्वर सिंह एक बार फिर टिकट पाने से पिछड़ गए। पूर्व सांसद अंतिम समय पैनल से नाम हटने के कारण से टिकट पाने में नाकाम रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मंडी उपचुनाव के लिए अंतिम समय में टिकट की दौड़ से बाहर होना एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी महेश्वर टिकट नहीं पा सके थे। इससे लग रहा है कि महेश्वर सिंह सियासत में पिछड़ रहे हैं। हिमाचल से पैनल में उनका नाम तो हाईकमान के पास भेजा गया था, लेकिन अंतिम समय में वह टिकट पाने में नाकाम रहे।
महेश्वर पहली बार मंडी लोकसभा सीट से 1989 में केंद्रीय मंत्री सुखराम को हराकर संसद की दहलीज तक पहुंचे थे। दो बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहे। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसा भी वक्त था, जब देश में कांग्रेस का बोलबाला था, उस दौर में शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और महेश्वर सिंह ने प्रदेश में भाजपा के पौधे को पसीना बहा कर सींचा और मजबूत किया है और पार्टी को सत्ता में भी लाया है। महेश्वर के 40 साल के राजनीतिक सफर में काफी उतार चढ़ाव आए हैं। कुछ समय तक उन्होंने पार्टी से अलग होकर अपनी लोकहित पार्टी भी बनाई। लंबे समय से राजनीति में रहकर लोगों के बीच भी गहरी पैठ है। टिकट न मिलने से महेश्वर सिंह के समर्थक भी काफी मायूस हैं।
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महेश्वर पहली बार मंडी लोकसभा सीट से 1989 में केंद्रीय मंत्री सुखराम को हराकर संसद की दहलीज तक पहुंचे थे। दो बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहे। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसा भी वक्त था, जब देश में कांग्रेस का बोलबाला था, उस दौर में शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और महेश्वर सिंह ने प्रदेश में भाजपा के पौधे को पसीना बहा कर सींचा और मजबूत किया है और पार्टी को सत्ता में भी लाया है। महेश्वर के 40 साल के राजनीतिक सफर में काफी उतार चढ़ाव आए हैं। कुछ समय तक उन्होंने पार्टी से अलग होकर अपनी लोकहित पार्टी भी बनाई। लंबे समय से राजनीति में रहकर लोगों के बीच भी गहरी पैठ है। टिकट न मिलने से महेश्वर सिंह के समर्थक भी काफी मायूस हैं।
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