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Kullu News: मोनाल संरक्षण से नशा मुक्ति तक, गीतों को बनाया जनजागरण का माध्यम

Thu, 11 Jun 2026 11:01 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Thu, 11 Jun 2026 11:01 PM IST
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From Monal conservation to de-addiction: turning songs into a medium for public awareness.
कुल्लू। राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार के लिए चयनित लोकगायक इंद्रजीत केवल एक सफल गायक ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से सामाजिक जागरूकता फैलाने वाले कलाकार के रूप में भी अलग पहचान बनाई है।
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उन्होंने लोकसंगीत को मनोरंजन तक सीमित न रखकर समाज और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बनाया है। 12 मार्च 1992 को जन्मे इंद्रजीत को बचपन से ही गीत-संगीत में रुचि थी।
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मात्र 16 साल की उम्र में खुद लिखे और कंपोज किए गए 10 गीतों की पहली वीडियो एलबम दिल का क्या कसूर सीडी पर लांच की। 2016 में उनके सुपरहिट गीत हाड़े मेरे मामुआ ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। इसके बाद लाड़ी शाऊणी, पाखली माणू, बुधुआ मामा, साजा लागा माघे रा जैसे गीतों ने उन्हें प्रसिद्धि की ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
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इंद्रजीत का चर्चित गीत पाखली माणु हिमाचली टोपी में मोनाल पक्षी की वास्तविक कलगी के स्थान पर कृत्रिम कलगी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए विशेष रूप से सराहा गया। इस गीत ने वन्यजीव संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया और बड़ी संख्या में लोगों ने कृत्रिम कलगी अपनाई। उनकी इस पहल की सराहना करते हुए वन एवं वन्यजीव विभाग हिमाचल प्रदेश ने उन्हें प्रशंसा-पत्र देकर सम्मानित भी किया। संवाद
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