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Kullu News: गोंपा की भूमि की बोली में जुटी भीड़, संजीव रहे सफल बोलीदाता
Wed, 30 Jul 2025 12:13 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Wed, 30 Jul 2025 12:13 AM IST
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सिस्सू (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय जिला के कोकसर गोंपा में दो दिवसीय छेशू उत्सव का मंगलवार को कुतंग परंपरा के निर्वहन के साथ समापन हुआ। गोंपा में मंगलवार सुबह कोकसर, डिंफुक और रमथांग गांवों के ग्रामीण एकत्रित हुए। सबसे पहले गोंपा कमेटी के अध्यक्ष दोरजे ने माता छेरिंगमा की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद उन्होंने विगत एक वर्ष में हुए कार्यों की विस्तृत जानकारी दी।
इसके बाद सुबह करीब 11:30 बजे गोंपा की भूमि की तीन साल के लिए बोली लगी, जिसमें गोंधला के संजीव यंखरपा सफल बोलीदाता रहे। बोली के लिए इस बार भारी भीड़ देखी गई। इसमें 28 से अधिक बोलीदाताओं ने भाग लिया। इसके बाद नौनिहालों और बेटियों द्वारा कुतंग मांगे गए और सभी बड़े और बुजुर्गों ने उन्हें मिठाई के तौर पर राशि भेंट की।
गौर रहे कि कोकसर का छेशू उत्सव पूरी घाटी में कुतंग के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन कोकसर की बेटियां अपने बच्चों सहित मायके में आकर दो दिन छेशू उत्सव का आनंद लेती हैं और सखी-सहेलियां आपस में मिलकर सुख-दुख की बातें करती हैं।
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कोकसर गोंपा कमेटी के प्रधान दोरजे और उपप्रधान गोंबो ने बताया कि हर साल बौद्ध पंचांग के अनुसार छठे माह की चौथी तिथि को छेशू उत्सव मनाया जाता है। उत्सव तांबेरिया पूजा से शुरू और कुतंग परंपरा का निर्वहन होते ही संपन्न हुआ।
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इसके बाद सुबह करीब 11:30 बजे गोंपा की भूमि की तीन साल के लिए बोली लगी, जिसमें गोंधला के संजीव यंखरपा सफल बोलीदाता रहे। बोली के लिए इस बार भारी भीड़ देखी गई। इसमें 28 से अधिक बोलीदाताओं ने भाग लिया। इसके बाद नौनिहालों और बेटियों द्वारा कुतंग मांगे गए और सभी बड़े और बुजुर्गों ने उन्हें मिठाई के तौर पर राशि भेंट की।
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गौर रहे कि कोकसर का छेशू उत्सव पूरी घाटी में कुतंग के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन कोकसर की बेटियां अपने बच्चों सहित मायके में आकर दो दिन छेशू उत्सव का आनंद लेती हैं और सखी-सहेलियां आपस में मिलकर सुख-दुख की बातें करती हैं।
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कोकसर गोंपा कमेटी के प्रधान दोरजे और उपप्रधान गोंबो ने बताया कि हर साल बौद्ध पंचांग के अनुसार छठे माह की चौथी तिथि को छेशू उत्सव मनाया जाता है। उत्सव तांबेरिया पूजा से शुरू और कुतंग परंपरा का निर्वहन होते ही संपन्न हुआ।