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दशहरा के फिर जिंदा होंगी प्राचीन परंपराएं

Sun, 03 Oct 2021 08:48 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 03 Oct 2021 08:48 PM IST
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Ancient traditions will be alive again after Dussehra
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव इस बार दशकों पुराने स्वरूप में नजर आएगा। देवी-देवताओं का ही मेला होने के चलते इस बार पुरानी परंपराएं फिर जीवित होंगी। देवताओं के अस्थायी शिविरों में कुल्लवी नाटी, होरन व लालड़ी नृत्य से देवलू रात के समय मनोरंजन करेंगे। वर्तमान में लालचंद प्रार्थी कलाकेंद्र की चकाचौंध के बीच इनकी ओर दर्शकों का ध्यान बहुत कम ही जाता था।
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प्राचीन समय में दशहरा उत्सव के दौरान मनोरंजन का मुख्य साधन कुल्लवी नाटी, लालड़ी और होरन नृत्य होता था। देवताओं के अस्थायी शिविरों के बाहर ढोल-नगाड़ों के साथ रात भर नाटी का आयोजन चलता था। इस बार कलाकेंद्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होंगे। ऐसे में अस्थायी शिविरों के बाहर होरन और लालड़ी नृत्य के चलते खूब रौनक रहेगी। रात के समय होने वाले इन आयोजनों से दशहरा की चमक-धमक बरकरार रहेगी। हालांकि दिन के समय सभी देवी-देवताओं की सुबह के समय पूजा होगी। इसके बाद कुछ देवता भगवान नरसिंह की जलेब में शामिल होंगे। लालड़ी व होरन नृत्य शाम को आरती समाप्त होने के बाद किया जाएगा। होरन नृत्य एक खास किस्म का नृत्य होता है। इसेे ढोल-नगाड़ों की थाप पर किया जाता है। जिला देवी-देवता कारदार संघ के महासचिव नारायण चौहान ने कहा कि दशहरा में सभी देवी-देवता लाव-लश्कर के साथ शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि लालड़ी, होरन नृत्य से देवलू रात के समय मनोरंजन करेंगे। कई दशकों पहले भी यह नृत्य मेले का आकर्षण रहते थे। इस बार यह परंपराएं फिर जीवित हो उठेंगी।
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