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Kangra News: आधुनिकता के दौर में सिमटने लगा रली-शंकर मेला

Tue, 15 Apr 2025 05:34 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा Updated Tue, 15 Apr 2025 05:34 AM IST
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Rali-Shankar fair started shrinking in the era of modernity
मटौर और पुराना कांगड़ा में पहले मूर्तियों के विसर्जन के लिए पहुंचते थे हजारों लोग
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गांव से लेकर शहर तक 9 दिन तक होती थी रली-शंकर रूप की पूजा
संवाद न्यूज एजेंसी
कांगड़ा। देवी-देवताओं और प्राचीन परंपराओं से ही हिमाचल की पहचान है, लेकिन आधुनिकता के दौर में कुछ प्राचीन परंपराएं विलुप्त होती नजर आ रही हैं। इनमें से एक रली-शंकर पूजा भी शामिल है।
पहले हर गांव और शहर में रली-शंकर पूजा की जाती थी और फिर मूर्तियों को खड्डों में विसर्जित किया जाता था। पहले मिट्टी से रली-शंकर की छोटी-छोटी मूर्तियों स्वयं बनाई जाती थी और गांव की बहु-बेटियां इनकी सुबह-शाम पूजा-अर्चना करती थीं। रली-शंकर की बड़ी मूर्तियां को कुम्हारों से लाया जाता है। उसके बाद विधिवत उनका विवाह करवाया जाता था और फिर 9 दिन के बाद इन्हें खड्डों में विसर्जित कर दिया जाता था।
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मौजूदा समय में ये परंपराएं लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं, क्योंकि जिंदगी की भागदौड़ में किसी के पास इनके लिए समय ही नहीं है। एक समय था जब कांगड़ा के मटौर में 14 अप्रैल को बहुत बड़ा मेला लगता था और साथ बहती मनुणी खड्ड में लोग रली-शंकर की मूर्तियों को पूजा-अर्चना के उपरांत विसर्जित करते थे। ऐसे ही पुराना की बनेर खड्ड में भी इन मूर्तियों का विसर्जन किया जाता था, लेकिन अब इक्का-दुक्का लोग इन रली-शंकर की पूजा घरों में करते हैं। कांगड़ा और पुराना कांगड़ा के किशोरी लाल, पूर्ण चंद, त्रिलोचन चंद, हेमराज, जयराम, जगदीश, मेहर चंद आदि ग्रामीणों ने बताया कि मटौर और पुराना कांगड़ा में रली मेला में हजारों की संख्या में लोग आते थे और मेले में स्थानीय दुकानदारों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के व्यापारी भी मेले में आते थे, लेकिन आज के समय में इन दोनों स्थानों पर मेला सिमट कर रह गया है।
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