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Kangra News: सिर्फ दो अस्पतालों में रेडियोलॉजिस्ट, चार नागरिक अस्पतालों में व्यवस्था बीमार, करोड़ों की मशीनें बन रहीं कबाड़
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धर्मशाला। जिले के कई अस्पतालों में रेडियाेलॉजिस्ट की सुविधाओं के अभाव का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि रेडियाेलॉजिस्ट के बिना करोड़ों की मशीनें धूल फांक रही हैं। इससे जिले के दूरदराज इलाकों के मरीजों को धर्मशाला अस्पताल और टांडा मेडिकल कॉलेज का रुख करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त निजी क्लीनिकों में भी अतिरिक्त धन खर्च कर अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है।
मौजूदा समय की बात करें तो सिविल अस्पताल नूरपुर, जवालामुखी, जयसिंहपुर और कांगड़ा जैसे अस्पतालों में रेडियाेलॉजिस्ट के पद खाली होने की समस्या चल रही है। जोनल अस्पताल धर्मशाला की अल्ट्रासाउंड यूनिट में भी एक ही रेडियोलॉजिस्ट है। इसके अलावा प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान टांडा की बात करें तो निचले हिमाचल के छह जिलों की हजारों की आबादी का जिम्मा संभाल रहे मेडिकल कॉलेज टांडा पर भी इसका अतिरिक्त बोझ बढ़ना स्वभाविक है।
रेडियोलॉजिस्ट को अधिक वेतन
सूत्रों के मुताबिक सरकारी संस्थानों की अपेक्षा निजी अस्पतालों और बाहरी राज्यों में अधिक वेतन का कारण भी रेडियोलॉजिस्टों का सरकारी अस्पतालों से मुख मोड़ने का एक बड़ा कारण है। सरकारी अस्पतालों में एक रेडियोलॉजिस्ट का मासिक वेतन अनुमानित 35,000 से अधिक होता है। जबकि बाहरी राज्याें और बड़े निजी अस्पतालों में इन विशेषज्ञों को साल में लाखों का पैकेज भी उन्हें बाहरी राज्यों और निजी अस्पतालों का रुख करवा रहा है।
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यह है स्थिति
सिविल अस्पताल नूरपुर में गत पांच वर्षों से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है। अस्पताल के बाहर दो निजी अल्ट्रासाउंड यूनिट खुल गए हैं। इसमें रोजाना लगभग 100 से 150 के करीब मरीज अल्ट्रासाउंड करवाते हैं। देहरा अस्पताल में दो सालों से पद रिक्त है। ज्वालामुखी अस्पताल में चार माह से कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं है। सिविल अस्पताल जयसिंहपुर में 2019 से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली चल रहा है। 2019 में 10 दिन के लिए यहां एक रेडियोलॉजिस्ट आया था। उसके बाद आज तक यहां पद खाली चल रहा है। सिविल अस्पताल कांगड़ा में 10 साल से अल्ट्रासाउंड की मशीन जंग खा रही है।
प्री-कॉन्सेपशन एंड प्री-नेट डायग्नोस्टिक टेक्निक (पीसीसीएनडीटी) एक्ट के तहत छह माह की ट्रेनिंग का प्रावधान है। इस ट्रेनिंग के बाद प्रशिक्षु रेडियोलॉजी से संबंधित टेस्टों के लिए अधिकृत होंगे। इन प्रशिक्षुओं को उन अस्पतालों में नियुक्त किया जाएगा, जहां रेडियोलॉजिस्ट के पद खाली हैं। इससे काफी हद तक रेडियोलॉजिस्ट के पदों की समस्या का हल हो जाएगा। - डॉ. सुशील कुमार शर्मा, मुख्य चिकित्साधिकारी, जिला कांगड़ा।
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मौजूदा समय की बात करें तो सिविल अस्पताल नूरपुर, जवालामुखी, जयसिंहपुर और कांगड़ा जैसे अस्पतालों में रेडियाेलॉजिस्ट के पद खाली होने की समस्या चल रही है। जोनल अस्पताल धर्मशाला की अल्ट्रासाउंड यूनिट में भी एक ही रेडियोलॉजिस्ट है। इसके अलावा प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान टांडा की बात करें तो निचले हिमाचल के छह जिलों की हजारों की आबादी का जिम्मा संभाल रहे मेडिकल कॉलेज टांडा पर भी इसका अतिरिक्त बोझ बढ़ना स्वभाविक है।
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रेडियोलॉजिस्ट को अधिक वेतन
सूत्रों के मुताबिक सरकारी संस्थानों की अपेक्षा निजी अस्पतालों और बाहरी राज्यों में अधिक वेतन का कारण भी रेडियोलॉजिस्टों का सरकारी अस्पतालों से मुख मोड़ने का एक बड़ा कारण है। सरकारी अस्पतालों में एक रेडियोलॉजिस्ट का मासिक वेतन अनुमानित 35,000 से अधिक होता है। जबकि बाहरी राज्याें और बड़े निजी अस्पतालों में इन विशेषज्ञों को साल में लाखों का पैकेज भी उन्हें बाहरी राज्यों और निजी अस्पतालों का रुख करवा रहा है।
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यह है स्थिति
सिविल अस्पताल नूरपुर में गत पांच वर्षों से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है। अस्पताल के बाहर दो निजी अल्ट्रासाउंड यूनिट खुल गए हैं। इसमें रोजाना लगभग 100 से 150 के करीब मरीज अल्ट्रासाउंड करवाते हैं। देहरा अस्पताल में दो सालों से पद रिक्त है। ज्वालामुखी अस्पताल में चार माह से कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं है। सिविल अस्पताल जयसिंहपुर में 2019 से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली चल रहा है। 2019 में 10 दिन के लिए यहां एक रेडियोलॉजिस्ट आया था। उसके बाद आज तक यहां पद खाली चल रहा है। सिविल अस्पताल कांगड़ा में 10 साल से अल्ट्रासाउंड की मशीन जंग खा रही है।
प्री-कॉन्सेपशन एंड प्री-नेट डायग्नोस्टिक टेक्निक (पीसीसीएनडीटी) एक्ट के तहत छह माह की ट्रेनिंग का प्रावधान है। इस ट्रेनिंग के बाद प्रशिक्षु रेडियोलॉजी से संबंधित टेस्टों के लिए अधिकृत होंगे। इन प्रशिक्षुओं को उन अस्पतालों में नियुक्त किया जाएगा, जहां रेडियोलॉजिस्ट के पद खाली हैं। इससे काफी हद तक रेडियोलॉजिस्ट के पदों की समस्या का हल हो जाएगा। - डॉ. सुशील कुमार शर्मा, मुख्य चिकित्साधिकारी, जिला कांगड़ा।