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Kangra News: कम उपजाऊ जमीन को औषधीय खेती देगी नई जान
Sun, 20 Jul 2025 08:48 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Sun, 20 Jul 2025 08:48 AM IST
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जाच्छ स्तिथ क्षेत्रीय बागबानी व अनुसंधान केंद्र में तैयार किए औषधि पौधे। स्रोत : विभाग
जसूर (कांगड़ा)। बंजर और कम उपजाऊ जमीन भी अब किसानों के लिए आमदनी का नया साधन बन सकती है। क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र जाच्छ ने किसानों को औषधीय पौधों की खेती अपनाने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह खेती कम लागत में ज्यादा मुनाफा देती है। इसमें रासायनिक दवाओं के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे किसानों की अतिरिक्त खर्च से बचत होती है।
इस मानसून सीजन में किसान आंवला, तुलसी, नीम, एलोवेरा, अश्वगंधा, गिलोय, ब्राह्मी, शतावरी, अदरक, हल्दी, मेथी, हरड़ और बेहड़ा जैसे औषधीय पौधे लगा सकते हैं। पहले ये पौधे जंगलों में आसानी से मिलते थे, लेकिन वनों के क्षरण से अब इनकी संगठित खेती जरूरी हो गई है। औषधीय पौधों की खेती के लिए मिट्टी की गुणवत्ता का विशेष महत्व नहीं है, जिससे किसान बंजर और कम उपजाऊ भूमि का भी उपयोग कर सकते हैं।
औषधीय और सुगंधित पौधों की मांग भारत ही नहीं विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र जाच्छ किसानों को इन पौधों की उन्नत किस्में उपलब्ध करवा रहा है। उन्हें मौसम व भूमि के अनुसार पौधों का चयन करने और खेती की आधुनिक विधियां सिखा रहा है। प्रदेश में औषधीय पौधों के लिए अलग मंडी नही हैं और बिचौलिये भी सक्रिय है। ऐसे में संस्थान ने किसानों से आह्वान किया है कि वे अपनी उपज सीधे मंडियों में ही बेचें।
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औषधीय पौधों की खेती कम लागत में ज्यादा लाभ देती है और इसमें रासायनिक दवाओं का छिड़काव भी नहीं करना पड़ता। प्रदेश में औषधीय पौधों के लिए अलग मंडी न होने से किसान बिचौलियों के जरिए बेचने को मजबूर हैं और उचित दाम नहीं मिल पाता। किसानों से अपील है कि वे सीधे मंडियों में माल बेचें, जिससे उन्हें सही मूल्य प्राप्त हो सके।
-डॉ. विपन गुलेरिया, सह-निदेशक एवं वैज्ञानिक, क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान केंद्र जाच्छ
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इस मानसून सीजन में किसान आंवला, तुलसी, नीम, एलोवेरा, अश्वगंधा, गिलोय, ब्राह्मी, शतावरी, अदरक, हल्दी, मेथी, हरड़ और बेहड़ा जैसे औषधीय पौधे लगा सकते हैं। पहले ये पौधे जंगलों में आसानी से मिलते थे, लेकिन वनों के क्षरण से अब इनकी संगठित खेती जरूरी हो गई है। औषधीय पौधों की खेती के लिए मिट्टी की गुणवत्ता का विशेष महत्व नहीं है, जिससे किसान बंजर और कम उपजाऊ भूमि का भी उपयोग कर सकते हैं।
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औषधीय और सुगंधित पौधों की मांग भारत ही नहीं विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र जाच्छ किसानों को इन पौधों की उन्नत किस्में उपलब्ध करवा रहा है। उन्हें मौसम व भूमि के अनुसार पौधों का चयन करने और खेती की आधुनिक विधियां सिखा रहा है। प्रदेश में औषधीय पौधों के लिए अलग मंडी नही हैं और बिचौलिये भी सक्रिय है। ऐसे में संस्थान ने किसानों से आह्वान किया है कि वे अपनी उपज सीधे मंडियों में ही बेचें।
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औषधीय पौधों की खेती कम लागत में ज्यादा लाभ देती है और इसमें रासायनिक दवाओं का छिड़काव भी नहीं करना पड़ता। प्रदेश में औषधीय पौधों के लिए अलग मंडी न होने से किसान बिचौलियों के जरिए बेचने को मजबूर हैं और उचित दाम नहीं मिल पाता। किसानों से अपील है कि वे सीधे मंडियों में माल बेचें, जिससे उन्हें सही मूल्य प्राप्त हो सके।
-डॉ. विपन गुलेरिया, सह-निदेशक एवं वैज्ञानिक, क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान केंद्र जाच्छ

जाच्छ स्तिथ क्षेत्रीय बागबानी व अनुसंधान केंद्र में तैयार किए औषधि पौधे। स्रोत : विभाग