{"_id":"6ab3dcdd44131fc3f00057cc","slug":"language-is-constantly-evolving-literature-gives-direction-to-society-prof-rajnish-kangra-news-c-95-1-kng1037-257361-2026-09-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"भाषा निरंतर परिवर्तनशील, साहित्य समाज को देता है दिशा : प्रो. रजनीश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भाषा निरंतर परिवर्तनशील, साहित्य समाज को देता है दिशा : प्रो. रजनीश
Thu, 24 Sep 2026 07:35 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Thu, 24 Sep 2026 07:35 AM IST
विज्ञापन
धर्मशाला। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि भाषा एक निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया है और साहित्य समाज को सही दिशा देने वाला सबसे सशक्त माध्यम है। वे हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयू) के हिंदी विभाग और राजभाषा अनुभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को बतौर मुख्यातिथि संबोधित कर रहे थे।
संगोष्ठी के अंतिम दिन साहित्यिक प्रस्तुतियों के साथ हिंदी भाषा और साहित्य के समक्ष खड़ी वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर मंथन हुआ। विभागाध्यक्ष प्रो. चंद्रकांत सिंह ने बताया कि पहले सत्र ‘कविता के रंग : हिंदी के संग’ में प्रदेश के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। कवि अशोक दर्द ने सामाजिक विसंगतियों को अपनी कविताओं में उठाया, जबकि डॉ. चंद्ररेखा ढडवाल ने गीतों के माध्यम से नारी चेतना को स्वर दिया।
वहीं, डॉ. प्रताप जरयाल ने अपनी गजलों के जरिए सामाजिक संघर्ष और उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को सामने रखा। सायंकालीन सत्र ‘वर्तमान समय में हिंदी भाषा की चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर केंद्रित रहा। इसमें मुख्य वक्ता प्रो. जगदीश शर्मा ने प्रतिभागियों को हिंदी व्याकरण के सूक्ष्म नियमों को सरल और सहज उदाहरणों के साथ समझाया। संगोष्ठी के दोनों सत्रों में साहित्यकारों और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
संगोष्ठी के अंतिम दिन साहित्यिक प्रस्तुतियों के साथ हिंदी भाषा और साहित्य के समक्ष खड़ी वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर मंथन हुआ। विभागाध्यक्ष प्रो. चंद्रकांत सिंह ने बताया कि पहले सत्र ‘कविता के रंग : हिंदी के संग’ में प्रदेश के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। कवि अशोक दर्द ने सामाजिक विसंगतियों को अपनी कविताओं में उठाया, जबकि डॉ. चंद्ररेखा ढडवाल ने गीतों के माध्यम से नारी चेतना को स्वर दिया।
विज्ञापन
वहीं, डॉ. प्रताप जरयाल ने अपनी गजलों के जरिए सामाजिक संघर्ष और उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को सामने रखा। सायंकालीन सत्र ‘वर्तमान समय में हिंदी भाषा की चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर केंद्रित रहा। इसमें मुख्य वक्ता प्रो. जगदीश शर्मा ने प्रतिभागियों को हिंदी व्याकरण के सूक्ष्म नियमों को सरल और सहज उदाहरणों के साथ समझाया। संगोष्ठी के दोनों सत्रों में साहित्यकारों और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
विज्ञापन