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Kangra News: बच्चों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहे पुरातत्व विभाग के नियम, जर्जर भजन में चल रहीं कक्षाएं

Mon, 11 Nov 2024 08:31 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 11 Nov 2024 08:31 AM IST
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Government's statement to form new Panchayats brings hope for Yol residents
मनीष कुमार
ग्राउंड रिपोर्ट-
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72 वर्ष पुराने मसरूर स्कूल पर पुरातत्व विभाग के कानून पड़ रहे भारी
निर्माण पर लगी पाबंदियों के चलते नहीं हो रहा निर्माण, पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने खुद के बनाया शौचालय और पर्यटक एंट्री काउंटर
स्कूल परिसर के साथ पुरातत्व विभाग के अधीन है हिमाचल का एकमात्र रॉक कट टैंपल
प्रवीण प्रकाश कुमार
धर्मशाला। कांगड़ा जिला के प्रसिद्ध मसरूर रॉक कट टेंपल के निकट चल रहे 72 साल पुराने स्कूल पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का ऐतिहासिक महत्व की संरक्षित इमारतों के लिए लागू कानून भारी पड़ रहा है। यह कानून 100 मीटर के दायरे तक किसी निर्माण की इजाजत नहीं देता है। जिसकी वजह से इस स्कूल के बच्चे अनसेफ घोषित हो चुके भवन में कक्षाएं लगाने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि तूफान या तेज हवाएं चलने पर स्लेटपोश जर्जर स्कूल भवन की छत हिलने लगती है। पाबंदियों की हद यहां तक है कि स्कूल प्रशासन बच्चों के लिए एक शौचालय का निर्माण भी नहीं करवा पा रहा है। शिक्षा के अधिकार पर भारी पड़ रहे इस नियम की वजह से मसरूर स्कूल के लिए पूर्व में स्वीकृत हो चुकी धनराशि कई बार वापस भी हो चुकी है। दुर्गम इलाके में चल रहे इस स्कूल में अध्ययनरत बच्चों के अभिभावकों की मजबूरी यह भी है कि उनके पास बच्चों को किसी अन्य स्कूल भेजने का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। हैरानी की बात यह है कि हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने खुद अपने लिए तो मंदिर के समीप सार्वजनिक शौचालय और पर्यटकों की एंट्री के लिए एक काउंटर का निर्माण कर लिया है। लेकिन शिक्षा के मंदिर के लिए कई तरह की अड़चनें खड़ी कर बच्चों के भविष्य पर बंदिशें लगा दी हैं। बरसात के मौसम में अभिभावकों को अपने बच्चों की चिंता सताती है। धूप के बावजूद स्कूल के विद्यार्थी खुले आसमान के नीचे कक्षाएं लगाने को मजबूर हैं।
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बाक्स:
स्कूल से सटा हुआ है रॉक कट टेंपल-
दरअसल मसरूर में हिमाचल का पहला रॉक कट टैंपल है। मंदिर परिसर के साथ ही राजकीय प्राथमिक पाठशाला और राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाएं चल रही हैं। कक्षा एक से लेकर पांचवीं कक्षा तक कुल 14 विद्यार्थी शिक्षा हासिल कर रहे हैं। सभी पांचों कक्षाएं स्कूल के एकमात्र भवन में चल रही हैं। जबकि स्कूल के एक अन्य कमरे में स्कूल कार्यालय चलता है और दूसरे कमरे में मिड-डे-मील बनता है। एक अन्य कच्चा कमरा बारिश में जमींदोज हो चुका है। इसी तरह राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक में कुल 60 विद्यार्थी शिक्षा हासिल कर रहे हैं। स्कूल में कुल आठ कमरे हैं, जिसमें से पांच कमरे असुरक्षित घोषित हो चुके हैं। शेष तीन कमरों में स्कूल कार्यालय और पांच कक्षाएं चल रही हैं।
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कोट्स:
13 गांवों के बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं। यहां से नगरोटा सूरियां का स्कूल 16 किलोमीटर तो लंज स्कूल 12 किलोमीटर की दूरी पर है। ललूड़ी, कपाड़ी, ठंबा और घरयार यह चार गांवों तो जंगल में हैं, जहां से बच्चे बड़ी मुश्किल से स्कूल पहुंचते हैं। स्कूल भवन की मरम्मत को लेकर पूर्व में विधायक, शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के समक्ष कई बार मामला उठा चुके हैं। अब नई विधायक और मुख्यमंत्री से काफी उम्मीद है।
-अनिल कुमार, प्रधान, स्कूल प्रबंधन समिति मसरूर।

कोट्स:
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने स्कूल भवन के निर्माण में रोड़ा डाला हुआ है। गांवों के बच्चों के लिए मसरूर स्कूल ही एकमात्र नजदीकी स्कूल है। इस मामले को स्थानीय विधायक कमलेश ठाकुर के समक्ष भी उठाया है और उन्होंने हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया है।
-प्रवेश कुमार, प्रधान, ग्राम पंचायत मसरूर।

कोट्स:
ऐतिहासिक महत्व के अधीन आने वाले क्षेत्र में 100 मीटर के दायरे में सभी प्रकार के निर्माण कार्य वर्जित है। जबकि 200 मीटर की दूरी पर कुछ नियमों व शर्तों के साथ निर्माण हो सकता है। अगर शिक्षा विभाग लिखित में आवेदन करेगा तो इस मामले को उच्चाधिकारियों के समक्ष उठाया जाएगा।

-प्रशांत डोगरा, संरक्षक सहायक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग।

कोट्स:
मौजूदा स्कूल भवन की जगह नया भवन बनाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के कानून आड़े आ रहे हैं। जिसके चलते गांव में अन्य जगह 25 कनाल अतिरिक्त भूमि का नए स्कूल भवन के चयन कर वन विभाग से क्लीयरेंस के लिए भी फाइल भेजी थी। लेकिन बरसात में चयनित भूमि पर भूस्खलन हुआ है, जिसके चलते वहां भी भवन नहीं बन सकता। अब नई साइट ढूंढी जा रही है।
-कंचन ज्योति, उपनिदेशक, उच्चतर शिक्षा विभाग, कांगड़ा स्थित धर्मशाला
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मनीष कुमार

मनीष कुमार

मनीष कुमार

मनीष कुमार

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