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Kangra News: ''संदिग्ध जानवर के काटने से इलाज में देरी हो सकती है खतरनाक''
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धर्मशाला। स्वास्थ्य विभाग की ओर से विश्व रेबीज दिवस के उपलक्ष्य में क्षेत्रीय अस्पताल धर्मशाला के सभागार में जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. ओमेश भारती की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम में रेबीज की रोकथाम, प्राथमिक उपचार और भ्रांतियों को दूर करने पर मंथन हुआ।
उन्होंने इस वर्ष की थीम स्ट्रॉन्गर टुगेदर का उल्लेख करते हुए कहा कि रेबीज वैक्सीन से पूरी तरह रोकी जा सकने वाली बीमारी है। लक्षण दिखने के बाद यह लगभग हमेशा घातक साबित होती है। इसलिए किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने या खरोंचने पर उपचार में जरा भी देरी जानलेवा हो सकती है।
सीएमओ ने बताया कि मानव रेबीज के अधिकांश मामलों में संक्रमित कुत्तों की मुख्य भूमिका होती है। संक्रमण संक्रमित पशु की लार, खरोंच या आंख-मुंह की श्लेष्म झिल्ली के संपर्क में आने से भी फैल सकता है। उन्होंने पालतू व सामुदायिक कुत्तों के नियमित टीकाकरण और बच्चों में जागरूकता बढ़ाने पर बल दिया।
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वहीं, जिला कार्यक्रम अधिकारी डॉ. राजेश सूद ने कहा कि कुत्ते के अलावा बिल्ली, बंदर और नेवला जैसे जंगली व घरेलू स्तनधारी भी इसके वाहक हो सकते हैं। लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, अत्यधिक लार, निगलने व पानी पीने में कठिनाई (हाइड्रोफोबिया) और पक्षाघात शामिल हैं।
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झाड़-फूंक से बचें, 15 मिनट बहते पानी से धोएं घाव
डॉ. राजेश सूद ने आगाह किया कि जानवर के काटने या खरोंचने पर घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं और बिना समय गंवाए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें। चिकित्सक की सलाह पर रेबीज वैक्सीन और जरूरत पड़ने पर इम्युनोग्लोबुलिन लगवाएं। घाव पर मिर्च, तेल, हल्दी, जड़ी-बूटी या कोई रसायन लगाने से बचें और झाड़-फूंक में समय बर्बाद न करें।
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उन्होंने इस वर्ष की थीम स्ट्रॉन्गर टुगेदर का उल्लेख करते हुए कहा कि रेबीज वैक्सीन से पूरी तरह रोकी जा सकने वाली बीमारी है। लक्षण दिखने के बाद यह लगभग हमेशा घातक साबित होती है। इसलिए किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने या खरोंचने पर उपचार में जरा भी देरी जानलेवा हो सकती है।
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सीएमओ ने बताया कि मानव रेबीज के अधिकांश मामलों में संक्रमित कुत्तों की मुख्य भूमिका होती है। संक्रमण संक्रमित पशु की लार, खरोंच या आंख-मुंह की श्लेष्म झिल्ली के संपर्क में आने से भी फैल सकता है। उन्होंने पालतू व सामुदायिक कुत्तों के नियमित टीकाकरण और बच्चों में जागरूकता बढ़ाने पर बल दिया।
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वहीं, जिला कार्यक्रम अधिकारी डॉ. राजेश सूद ने कहा कि कुत्ते के अलावा बिल्ली, बंदर और नेवला जैसे जंगली व घरेलू स्तनधारी भी इसके वाहक हो सकते हैं। लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, अत्यधिक लार, निगलने व पानी पीने में कठिनाई (हाइड्रोफोबिया) और पक्षाघात शामिल हैं।
झाड़-फूंक से बचें, 15 मिनट बहते पानी से धोएं घाव
डॉ. राजेश सूद ने आगाह किया कि जानवर के काटने या खरोंचने पर घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं और बिना समय गंवाए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें। चिकित्सक की सलाह पर रेबीज वैक्सीन और जरूरत पड़ने पर इम्युनोग्लोबुलिन लगवाएं। घाव पर मिर्च, तेल, हल्दी, जड़ी-बूटी या कोई रसायन लगाने से बचें और झाड़-फूंक में समय बर्बाद न करें।