आईआईटी के प्रोफेसर का दावा: लांगटांग ग्लेशियर को गोरखा भूकंप ने किया था कमजोर, टूटने से नेपाल में मची तबाही
प्रोफेसर शुक्ला के अनुसार गोरखा भूकंप के बाद ग्लेशियर का एक हिस्सा अपनी मूल संरचना से अलग होकर हैंगिंग ग्लेशियर की स्थिति में पहुंच गया और लंबे समय तक अस्थिर बना रहा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और तबाही के पीछे केवल जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि 11 साल पहले वर्ष 2015 में आया विनाशकारी गोरखा भूकंप भी बड़ी वजह है। इस भूकंप ने लांगटांग ग्लेशियर की संरचना को ही कमजोर कर दिया था, जिसके टूटने से नेपाल में तबाही मच गई। यह दावा आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के संस्थापक अध्यक्ष एवं एसोसिएट प्रोफेसर डेरेक्स पी. शुक्ला ने किया है। उन्होंने सैटेलाइट चित्रों और भूवैज्ञानिक तकनीकों से किए प्रारंभिक आकलन के आधार पर यह खुलासा किया है।
प्रोफेसर शुक्ला ने ये कहा
प्रोफेसर शुक्ला के अनुसार गोरखा भूकंप के बाद ग्लेशियर का एक हिस्सा अपनी मूल संरचना से अलग होकर हैंगिंग ग्लेशियर की स्थिति में पहुंच गया और लंबे समय तक अस्थिर बना रहा। 26 अगस्त को उत्तरी हिस्से के टूटने पर भारी मात्रा में बर्फ, मलबा और बड़े बोल्डर नीचे की ओर बह गए, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में विनाशकारी स्थिति पैदा हुई। नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के अनुसार इस घटना में अब तक 1,252 लोगों की मौत हो चुकी है और 4,875 अब भी लापता हैं। प्रोफेसर शुक्ला का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन ही इस घटना की मुख्य वजह होती तो आसपास के अन्य ग्लेशियरों में भी इसी प्रकार के व्यापक बदलाव दिखाई देते।
भूकंप के बाद ग्लेशियर की संरचना में बदलाव के संकेत मिले
उन्होंने बताया कि आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक, सैटेलाइट चित्रों, उपलब्ध फोटो और वीडियो के साथ भूवैज्ञानिक तथ्यों का विश्लेषण कर ग्लेशियर की पुरानी और वर्तमान स्थिति की तुलना की गई। प्रारंभिक तकनीकी आकलन में वर्ष 2015 के भूकंप के बाद ग्लेशियर की संरचना में बदलाव के संकेत मिले हैं। हालांकि, घटना के सटीक कारणों की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन अभी जारी है। गोरखा भूकंप के दौरान वर्ष 2015 में लांगटांग ग्लेशियर के दक्षिणी हिस्से की ओर भी भारी टूट-फूट हुई थी। इसके बाद बर्फ, पत्थर और मलबे ने नीचे स्थित गोंपा और लांगटांग क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया था। अब 26 अगस्त को उत्तरी मुख की ओर का हिस्सा टूटकर गिरा। इस बार भी भारी मात्रा में मलबा और बड़े बोल्डर नीचे की ओर बहने से जानमाल का बड़ा नुकसान हुआ।
हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से बढ़ जाता है खतरा
प्रो. शुक्ला के अनुसार सामान्य ग्लेशियर के टूटने की तुलना में ऊंचाई पर अस्थिर स्थिति में मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से तबाही का दायरा बढ़ जाता है। इसके टूटने पर बर्फ के साथ भारी मात्रा में पत्थर और मलबा तेजी से नीचे की ओर आता है। उन्होंने बताया कि लांगटांग क्षेत्र में पहले भी फ्लैश फ्लड की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में इस क्षेत्र की भौगोलिक अस्थिरता को समझने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे भौगोलिक बदलावों का अध्ययन करते हैं शुक्ला
प्रो. डेरेक्स पी. शुक्ला की विशेषज्ञता रिमोट सेंसिंग, जियोग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम, भूस्खलन, परमा फ्रॉस्ट, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण भूविज्ञान में है। वह सैटेलाइट चित्रों और आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों के माध्यम से हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे भौगोलिक बदलावों का अध्ययन करते हैं।