हिमाचल प्रदेश: रत्न मंजरी बोलीं- जनजातीय महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई जारी रहेगी; सरकार से की ये मांग
लंबे समय से जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष कर रही रत्न मंजरी ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए फैसले में टिप्पणी की है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर तब तक लागू नहीं होता, जब तक केंद्र सरकार इसे विशेष रूप से अधिसूचित न करे। इसलिए केंद्र सरकार को ऐसे कानून में संशोधन करना चाहिए। पढ़ें पूरी खबर...
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जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार दिलाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही रत्न मंजरी ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जन जातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार दिलाने के उनका संघर्ष जारी है और आगे भी रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक व्यक्तिगत मामले पर आया है। यह देखना होगा कि यह फैसला सब पर लागू होगा या नहीं।
प्रदेश की पहली महिला पंचायत प्रधान का गौरव हासिल करने वाली रत्न मंजरी ने बताया कि जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार दिलाने के लिए उनकी संस्था महिला कल्याण परिषद की ओर से साल 2019 में प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। यह मामला न्यायालय के विचाराधीन है। उन्हें उम्मीद है कि इस मामले का फैसला जनजातीय महिलाओं के हक में आएगा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए फैसले में टिप्पणी की है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर तब तक लागू नहीं होता, जब तक केंद्र सरकार इसे विशेष रूप से अधिसूचित न करे। इसलिए केंद्र सरकार को ऐसे कानून में संशोधन करना चाहिए। इसके लिए प्रदेश के स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं को आवाज उठानी होगी। स्थानीय नेताओं को इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समय के साथ जनजातीय क्षेत्र के लोगों का रहन सहन बदल गया है। समय भी आधुनिक रूप ले चुका है। नई पीढ़ी भी पढ़ी लिखी है। निचले क्षेत्र की महिलाओं को अदालत ने पैतृक संपत्ति का अधिकार दिया है तो जनजातीय क्षेत्र की महिलाओं को इससे वंचित नहीं रखना चाहिए। बताया कि जनजातीय महिलाओं के अधिकारों के लिए वह मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पत्र लिख चुकी हैं। राष्ट्रपति से मिलकर इस मुद्दे को उठा चुकी हैं। भविष्य में इस मुद्दे को विभिन्न मंचों पर उठाती रहेंगी। अदालत में भी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ी जा रही है। अभी जरूरत है कि इस मामले की अदालत तेजी से सुनवाई हो।
उन्होंने कहा कि लड़कियां हमेशा घर बनाने की सोचती हैं। लोगों को यह सोच भी बदली होगी कि लड़कियां उनका हक छीन कर किसी दूसरे को दे देंगी। बता दें कि किन्नौर और लाहौल-स्पीति में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं है। इसी अधिकार को दिलाने के लिए रत्न मंजरी तीन दशक से लड़ रही हैं। 70 बसंत पार कर चुकी किन्नौर के रिब्बा गांव की रत्न मंजरी जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति का हक दिलाने के लिए करीब तीस साल से जुटी हुई हैं। रत्न मंजरी तीन बार जिला परिषद सदस्य और पांच बार पंचायत प्रधान रह चुकी हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए एक फैसले में कहा कि हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में बेटियों को पैतृक संपत्ति का अधिकार हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम 1956 के तहत नहीं मिलेगा। इन क्षेत्रों में अभी भी परंपरागत और सामाजिक रीति रिवाज(कस्टमरी लॉ) ही लागू रहेंगे। कस्टमरी लॉ के अनुसार किन्नौर में संपत्ति का उत्तराधिकारी पुरुष संतान ही होती है। यदि किसी पुरुष की मृत्यु बिना किसी पुत्र के हो जाती है, तो उसकी संपत्ति उसकी बेटियों को तब तक मिलती है, लेकिन उन्हें उस संपत्ति को बेचने, उपहार में देने या बांटने का अधिकार नहीं होता। यदि बेटी का विवाह हो जाता है, तो संपत्ति पैतृक उत्तराधिकारी को वापस मिल जाती है।