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HP High Court: हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा- चतुर्थ श्रेणी कर्मी को 60 वर्ष की आयु तक सेवा का अधिकार, मिलेंगे लाभ

Tue, 30 Dec 2025 10:22 AM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Tue, 30 Dec 2025 10:22 AM IST
सार

यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति 10 मई 2001 से पहले हुई है, तो वह 60 वर्ष की आयु तक सेवा का हकदार है, भले ही उसका नियमितीकरण 2001 के बाद हुआ हो। ये कहना है हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का। जानें विस्तार से...
 

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HP High Court has ruled that a Class IV employee has right to service until age of 60
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के मामले कहा कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति 10 मई 2001 से पहले हुई है, तो वह 60 वर्ष की आयु तक सेवा का हकदार है, भले ही उसका नियमितीकरण 2001 के बाद हुआ हो। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को 60 वर्ष की आयु तक सेवा में माना जाएगा, क्योंकि कर्मचारी ने 58 से 60 वर्ष की अवधि के दौरान वास्तविक कार्य नहीं किया है। उन्हें इस अवधि का वेतन नोशनल (काल्पनिक) आधार पर दिया जाएगा। हालांकि, इस 2 साल की अवधि को जोड़ते हुए उनकी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पुन: निर्धारण किया जाएगा। बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करना होगा। न्यायाधीश रंजन शर्मा की अदालत ने यह फैसला हजारी लाल बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में पारित किया है।

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याचिकाकर्ता को 18 जनवरी 1995 को मंडी के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला कुजाबलह में पार्टटाइम वॉटर कैरियर के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्ष 2012 में उसे पूर्णकालिक दैनिक वेतनभोगी बनाया गया और जनवरी 2014 में उसकी सेवाओं को नियमित किया गया। हालांकि, विभाग ने 31 जनवरी 2017 को 58 वर्ष की आयु पूरी होने पर उसे सेवानिवृत्त कर दिया। याचिकाकर्ता ने 58 वर्ष पर सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती देते हुए 60 वर्ष की आयु (31 जनवरी 2019) तक सेवा लाभ की मांग की थी। कोर्ट ने माना कि सेवा की आयु निर्धारित करने के लिए नियमितीकरण की तिथि के बजाय प्रथम नियुक्ति की तिथि को आधार माना जाना चाहिए। उसे 58 साल में रिटायर करना भेदभावपूर्ण है।

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एसएमसी शिक्षकों की भर्ती रहेगी जारी अंतिम निर्णय अदालत के अधीन रहेगा
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) के माध्यम से नियुक्त शिक्षकों को लेकर दायर याचिका पर सरकार को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि एसएमसी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन अंतिम निर्णय न्यायालय के अधीन होगा।
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न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार की ओर से शुरू की गई किसी भी प्रक्रिया से फिलहाल किसी को कोई विशेष अधिकार नहीं मिलेगा। यह पूरी प्रक्रिया याचिका पर कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगी। मामले की अगली सुनवाई अब 5 जनवरी को होगी। याचिकाकर्ताओं ने 25 अक्तूबर 2025 की अधिसूचना को भी चुनौती दी है, जिसमें 1,427 विभिन्न श्रेणियों (टीजीटी , शास्त्री, डीएम, एलटी और जेबीटी) के पदों को सीमित सीधी भर्ती के माध्यम से एसएमसी शिक्षकों से भरने का प्रस्ताव है।

अदालत को बताया गया कि एसएमसी शिक्षकों के लिए 5 फीसदी कोटा निर्धारित किया है। यह मामला उन अभ्यर्थियों (याचिकाकर्ताओं) की ओर से दायर किया गया है जो नियमित भर्ती के लिए पात्र हैं। उनका तर्क है कि सरकार नियमित भर्ती के बजाय लंबे समय से एसएमसी के जरिये बैक डोर एंट्री कर रही है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पिछले आदेशों के बावजूद सरकार नियमित पद भरने के बजाय एसएमसी शिक्षकों को ही समायोजित करने की कोशिश कर रही है।

2012 से सेवाएं दे रहे एसएमसी शिक्षक
सरकार की ओर से दलील दी कि एसएमसी शिक्षक साल 2012 से सेवाएं दे रहे हैं। इनमें से अधिकतर सरकारी सेवा की अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं। सरकार ने नियमों में संशोधन कर 5 फीसदी कोटा और आयु सीमा में छूट दी है ताकि उनके अनुभवों का लाभ लिया जा सके। सरकार अन्य श्रेणियों बैच वाइज और सीधी भर्ती के लिए भी 32.5 फीसदी और 37.5 फीसदी कोटे के तहत भर्तियां कर रही है।

दिव्यांगों को अनुबंध नहीं, नियमित नियुक्ति का अधिकार : हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दिव्यांग की आरक्षित पदों पर नियुक्तियां नियमित आधार पर होनी चाहिए न कि अनुबंध पर। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने दीपक गुप्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए विभाग की ओर से उनकी नियमितीकरण की मांग को खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को साल 2008 से ही नियमित क्लर्क माना जाए और उसे वेतन निर्धारण, एरियर, वरिष्ठता और पदोन्नति जैसे सभी लाभ दिए जाएं।

याचिकाकर्ता की नियुक्ति क्लर्क के रूप में साल 2008 में आईपीएच विभाग में दिव्यांग कोटे के तहत अनुबंध आधार पर हुई थी। सरकार की सामान्य नीति के अनुसार उन्हें कई वर्षों बाद 2015 में नियमित किया गया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि उन्हें उनके शुरुआती नियुक्ति वर्ष (2008) से ही नियमित माना जाए। दिव्यांग अधिनियम की धारा 33 के तहत आरक्षित पदों पर अनुबंध के आधार पर नियुक्ति देना कानून की मूल भावना के खिलाफ है। विभाग ने यह कहकर याचिकाकर्ता की मांग ठुकरा दी थी कि तत्कालीन भर्ती एवं पदोन्नति (आरएंडपी) नियमों में अनुबंध पर नियुक्ति का प्रावधान था। हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार कानून के उद्देश्य को विफल नहीं कर सकती।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान दिला राम और नितिन कुमार के पुराने फैसलों का हवाला दिया, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। कोर्ट ने कहा कि दिव्यांग अधिनियम 1995 का उद्देश्य दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में लाना है। अनुबंध या तदर्थ नियुक्तियां देने से इस कानून का उद्देश्य निष्प्रभावी हो जाता है। आरक्षण का अर्थ है ऐसी नौकरी प्रदान करना जिसमें स्थायित्व हो और यह केवल नियमित नियुक्ति के माध्यम से ही संभव है।
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