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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   history of the Kahlur princely state has once again been submerged in Gobind Sagar Lake; eight historic temple

बिलासपुर: गोबिंद सागर झील में फिर समा गया कहलूर रियासत का इतिहास, पानी में डूबे आठ ऐतिहासिक मंदिर

Fri, 04 Sep 2026 07:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 04 Sep 2026 07:00 AM IST
सार

कहलूर रियासत की ऐतिहासिक विरासत एक बार फिर पानी में समा गई है। बरसात के बाद झील का पानी सांडू मैदान तक पहुंच गया है। इसके साथ ही झील में मौजूद कहलूर रियासत के करीब आठ ऐतिहासिक मंदिर भी जलमग्न हो गए हैं। 

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history of the Kahlur princely state has once again been submerged in Gobind Sagar Lake; eight historic temple
गोबिंद सागर झील में डूबे ऐतिहासिक मंदिर। - फोटो : संवाद

विस्तार

गोबिंद सागर झील का जलस्तर बढ़ते ही कहलूर रियासत की ऐतिहासिक विरासत एक बार फिर पानी में समा गई है। बरसात के बाद झील का पानी सांडू मैदान तक पहुंच गया है। इसके साथ ही झील में मौजूद कहलूर रियासत के करीब आठ ऐतिहासिक मंदिर भी जलमग्न हो गए हैं। अब करीब पांच से छह माह बाद, गर्मियों में जलस्तर कम होने पर ही ये मंदिर दोबारा दिखाई देंगे। ये मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कहलूर रियासत के इतिहास, स्थापत्य और शिल्पकला के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इन संरचनाओं में छठी से 17वीं सदी तक की शिल्प परंपरा, पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और प्राचीन मंदिर निर्माण शैली की झलक मिलती है। भाखड़ा बांध के निर्माण के बाद पुराना कहलूर क्षेत्र जलमग्न हो गया था। वर्ष 1960 में गोबिंद सागर झील के अस्तित्व में आने के बाद कहलूर रियासत के दर्जनों ऐतिहासिक मंदिर पानी में समा गए थे।

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ये मंदिर पानी में डूबे
रंगनाथ मंदिर, खनेश्वर, नारदेश्वर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, ककड़ी का ठाकुरद्वारा, नालू का ठाकुरद्वारा और खनमुखेश्वर मंदिर इनमें प्रमुख रहे हैं। इनमें से अब करीब आठ मंदिर ही ऐसे हैं, जो हर साल जलस्तर घटने पर लोगों को दिखाई देते हैं। गर्मियों में पानी उतरने पर झील के बीच इन मंदिरों का दृश्य स्थानीय लोगों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहता है। ऐतिहासिक मंदिरों के संरक्षण और शिफ्टिंग के लिए वर्ष 2021 में 1500 करोड़ रुपये की परियोजना तय की गई थी। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 1400 करोड़ और प्रदेश सरकार की ओर से 100 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रावधान था। 

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 परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी
योजना को तीन चरणों में पूरा किया जाना था। पहले चरण में नाले के नौण क्षेत्र में मौजूद गोपाल मंदिर समेत तीन मंदिरों को वैज्ञानिक तरीके से लिफ्ट कर धौलरा में सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने की योजना थी। इसके लिए मिट्टी के नमूने लिए गए और परीक्षण के बाद उन्हें उपयुक्त बताया गया था। मंदिरों का मॉड्यूल तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी। मंदिरों को लिफ्ट करने का काम पद्मश्री पुरातत्वविद केके मोहम्मद के दिशा-निर्देशन में और एलएंडटी के माध्यम से करवाने की योजना थी। हालांकि वर्ष 2022 में सत्ता परिवर्तन के बाद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

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पानी के साथ गाद भी बनी खतरा
इन ऐतिहासिक मंदिरों के लिए खतरा केवल पानी से नहीं है। झील में लगातार जमा हो रही गाद भी इनकी संरचनाओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। जलस्तर कम होने पर मंदिरों के आसपास गाद की मोटी परत दिखाई देती है। स्थानीय लोगों और जानकारों के अनुसार हर साल करीब आधा से एक फुट तक गाद जमा हो रही है। इससे मंदिर धीरे-धीरे गाद में धंसते जा रहे हैं। लंबे समय तक पानी और गाद के संपर्क में रहने से पत्थरों और मंदिरों की संरचना प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में इनका मूल स्वरूप बचाना मुश्किल हो सकता है।

सांडू मैदान को पर्यटन केंद्र बनाने की थी योजना
परियोजना के दूसरे चरण में सांडू मैदान को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव था। यहां नाव घाट, वॉकवे, संपर्क सड़कें, पार्किंग, पानी, बिजली और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी सुविधाएं विकसित की जानी थीं। तीसरे चरण में मंडी भराड़ी के पास बैराज बनाकर मंदिरों के आसपास जलाशय विकसित करने, रिवर फ्रंट और वॉकवे बनाने तथा वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों को बढ़ावा देने की योजना थी। परियोजना की डीपीआर तैयार कर एशियन डेवलपमेंट बैंक को भेजने की प्रक्रिया भी प्रस्तावित थी। वर्ष 2019 में इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज डेवलपमेंट की विशेषज्ञ टीम ने सांडू क्षेत्र के मंदिरों में लगे पत्थरों के नमूने लेकर उनके स्रोत का पता लगाने का प्रयास किया था।

पानी उतरने के बाद भी सुरक्षा का सवाल
गर्मियों में पानी उतरने के बाद मंदिर फिर दिखाई देते हैं, लेकिन उस समय भी सुरक्षा और निगरानी का अभाव रहता है। स्थानीय लोगों के अनुसार सुनसान रहने के कारण कई बार ये स्थान नशा करने वालों का अड्डा बन जाते हैं। ऐसे में धरोहरों को प्राकृतिक नुकसान के साथ मानवीय गतिविधियों से भी खतरा है।

भाजपा सरकार ने मंदिरों को शिफ्ट और लिफ्ट करने के लिए 1500 करोड़ रुपये की योजना स्वीकृत कराई थी। मिट्टी के सैंपल और ब्लू प्रिंट तैयार हो चुके थे। वर्ष 2022 में कांग्रेस सरकार आने के बाद योजना को किनारे कर दिया गया। भाजपा सत्ता में आई तो इसे पहली प्राथमिकता दी जाएगी। इससे कहलूर का इतिहास बचाने के साथ वाटर स्पोर्ट्स और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। -त्रिलोक जमवाल, विधायक सदर, विधानसभा

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