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Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- बॉन्ड राशि का मतलब कि काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते
Thu, 08 May 2025 05:00 AM IST
अंकेश डोगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Thu, 08 May 2025 05:00 AM IST
सार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि बॉन्ड राशि का भुगतान करने की पेशकश का मतलब है कि काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। क्या है पूरा मामला जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर...
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने डॉक्टर को सात दिन के भीतर 60 लाख रुपये बॉन्ड की राशि विभाग के पास जमा कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने प्रतिवादी विभाग को तकनीकी त्यागपत्र स्वीकार किए जाने और बॉन्ड की राशि प्राप्त होने के बाद याचिकाकर्ता के पक्ष में एनओसी जारी करने के निर्देश भी दिए हैं। याची अपनी ज्वाइनिंग देते समय इस प्रमाण पत्र को एम्स बिलासपुर में जमा कर सकेंगे।
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न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि बॉन्ड राशि का भुगतान करने की उनकी पेशकश का मतलब है कि उन्हें काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने यह फैसला प्रतिवादियों की ओर से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान बिलासपुर जिला बिलासपुर में सहायक प्रोफेसर (नियोनेटोलॉजी) के पद पर भर्ती के उद्देश्य से प्राथी के पक्ष में अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी न करने पर दिया। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए इस मामले को अनुपालना के लिए 13 मई को सूचीबद्ध किया है।
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सरकार की ओर से उनकी याचिका का विरोध किया गया। उन्होंने 2020 के बॉन्ड का हवाला देते हुए कहा कि सुपर-स्पेशियलिटी के बाद सात साल तक राज्य में सेवा देना के लिए सहमति व्यक्त की थी। अगर बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने पर 60 लाख रुपये के अलावा ब्याज और उनके कोर्स का वेतन देना था। सरकार की ओर से प्रदेश में विशेषज्ञों की कमी पर जोर देते हुए तर्क दिया कि एनओसी कोई अधिकार नहीं है।
वहीं एम्स ने पुष्टि करते हुए कहा कि पद अभी भी रिक्त है। 22 दिसंबर 2023 को याचिकाकर्ता के चयन के परिणामस्वरूप लंबित याचिका के कारण नियुक्ति नहीं हुई है। न्यायालय ने प्रतिवादियों की इस दलील को खारिज कर दिया कि एनओसी देने से डॉक्टरों की कमी के कारण जनता को नुकसान होगा। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का एम्स बिलासपुर में शामिल होने से कोई नुकसान नहीं होगा। एम्स केंद्र सरकार का संस्थान है जहां पर नियोनेटोलॉजी में बेहतर सुविधाओं दी जाती है। इससे राज्य के निवासियों को लाभ होगा।
वहीं एम्स ने पुष्टि करते हुए कहा कि पद अभी भी रिक्त है। 22 दिसंबर 2023 को याचिकाकर्ता के चयन के परिणामस्वरूप लंबित याचिका के कारण नियुक्ति नहीं हुई है। न्यायालय ने प्रतिवादियों की इस दलील को खारिज कर दिया कि एनओसी देने से डॉक्टरों की कमी के कारण जनता को नुकसान होगा। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का एम्स बिलासपुर में शामिल होने से कोई नुकसान नहीं होगा। एम्स केंद्र सरकार का संस्थान है जहां पर नियोनेटोलॉजी में बेहतर सुविधाओं दी जाती है। इससे राज्य के निवासियों को लाभ होगा।
यह है मामला
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2007 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। साल 2009 में मेडिकल ऑफिसर बन गया। विभाग ने 2011 में उसकी सेवाएं नियमित कर दी गईं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 2013 से 2016 तक बाल रोग में अपनी सेवाएं दीं। नियोनेटोलॉजी में डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन की पढ़ाई के लिए वह बाहर गए। एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2023 में आईजीएमसी में सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया। नवंबर 2023 में एम्स बिलासपुर ने सहायक प्रोफेसर के पदों के लिए विज्ञापन जारी किया।
याचिकाकर्ता ने इसके लिए आवेदन किया। चयनित होने के बावजूद अंतिम एनओसी की कमी के कारण वे शामिल नहीं हो सके। इसके बाद याचिकाकर्ता ने विभाग के समक्ष अंतिम एनओसी प्राप्त करने और अपने इस्तीफे की स्वीकृति मिलने पर बॉन्ड की राशि जमा करने की पेशकश की। इसके लिए उसने राज्य सरकार से अनुरोध किया लेकिन विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं मिला, इसे लेकर ही उसने अदालत में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यदि उन्हें अंतिम एनओसी प्रदान की जाती है तो वे एम्स में शामिल हो जाएंगे।
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2007 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। साल 2009 में मेडिकल ऑफिसर बन गया। विभाग ने 2011 में उसकी सेवाएं नियमित कर दी गईं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 2013 से 2016 तक बाल रोग में अपनी सेवाएं दीं। नियोनेटोलॉजी में डॉक्टरेट ऑफ मेडिसिन की पढ़ाई के लिए वह बाहर गए। एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2023 में आईजीएमसी में सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया। नवंबर 2023 में एम्स बिलासपुर ने सहायक प्रोफेसर के पदों के लिए विज्ञापन जारी किया।
याचिकाकर्ता ने इसके लिए आवेदन किया। चयनित होने के बावजूद अंतिम एनओसी की कमी के कारण वे शामिल नहीं हो सके। इसके बाद याचिकाकर्ता ने विभाग के समक्ष अंतिम एनओसी प्राप्त करने और अपने इस्तीफे की स्वीकृति मिलने पर बॉन्ड की राशि जमा करने की पेशकश की। इसके लिए उसने राज्य सरकार से अनुरोध किया लेकिन विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं मिला, इसे लेकर ही उसने अदालत में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यदि उन्हें अंतिम एनओसी प्रदान की जाती है तो वे एम्स में शामिल हो जाएंगे।