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HP High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- वरिष्ठ कर्मी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता

Sat, 13 Dec 2025 03:00 AM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Sat, 13 Dec 2025 03:00 AM IST
सार

किसी वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता है। ये कहना है हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का। जानें पूरा मामला...

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Himachal Pradesh High Court said a senior employee cannot be paid less than his junior
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के बीएसएल प्रोजेक्ट के मुख्य अभियंता की ओर से दायर अपील को 12 साल बाद खारिज करते हुए कहा कि किसी वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने कहा कि यह स्थापित कानून है कि एक वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं मिल सकता। खंडपीठ ने लेबर कोर्ट और एकल जज के फैसले को सही ठहराया और बीबीएमबी को मृतक अमरनाथ के आश्रितों को वेतन की बकाया राशि का भुगतान करने का आदेश दिया।

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अमर नाथ चार्ज मैन स्पेशल ग्रेड-एक ने अपने कनिष्ठ लाभ सिंह से कम मूल वेतन मिलने पर वेतन विसंगति का मामला उठाया था। अमर नाथ की नियुक्ति बीएसएल प्रोजेक्ट में 25 जुलाई 1974 को हुई और एक अक्तूबर 1976 को वह चार्ज मैन ग्रेड एक के रूप में पदोन्नत हुए। 17 जनवरी 1977 को वह चार्ज मैन स्पेशल ग्रेड-एक बने। एक जनवरी 1988 को उनका वेतन 1530 प्रति माह तय किया गया, जबकि उनके कनिष्ठ लाभ सिंह को 1640 प्रति माह दिया गया। अमर नाथ को प्रथम टाइम बाउंड स्केल 16 वर्ष की सेवा पूरी होने पर 25 जुलाई 1990 से मिला, जबकि लाभ सिंह को 1 जनवरी 1988 से ही मिल गया। अपीलकर्ता (बीबीएमबी) ने तर्क दिया कि टाइम बाउंड प्रमोशन केवल सीधी भर्ती से नियुक्त पदों के लिए स्वीकार्य है, इसलिए दोनों कर्मचारियों की तुलना नहीं की जा सकती। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।

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दिव्यांग कोटे के जेबीटी पदों को सीधी भर्ती से भरने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जेबीटी के 187 पदों पर दिव्यांग व्यक्तियों के लिए 4 फीसदी आरक्षण के तहत भर्ती की नई प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरएंडपी नियम जेबीटी के 50 फीसदी पद सीधी भर्ती और 50 फीसदी बैचवाइज आधार पर भरने का प्रावधान करते हैं।

आरएंडपी नियम के नियम 16 के तहत आरक्षण समय-समय पर सरकार की ओर से जारी आदेशों के अधीन है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी आपत्ति के चयन प्रक्रिया में भाग लिया था। असफल घोषित होने के बाद चयन प्रक्रिया को चुनौती देना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बैचवाइज चयन में भी यह जरूरी नहीं है कि हर उप श्रेणी के दिव्यांग को हर बार मौका मिले। कोर्ट ने पाया कि दिव्यांग के लिए आरक्षित सभी पदों को बैचवाइज चयन के दायरे से बाहर निकालने और उन्हें सीधी भर्ती से भरने के नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित जेबीटी पदों को बैचवाइज आधार पर भरने के बजाय एक नई चयन प्रक्रिया (सीधी भर्ती और मूल्यांकन मानदंडों पर आधारित) अपनाई गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह प्रक्रिया भर्ती एवं पदोन्नति नियमों का उल्लंघन करती है, जिसमें 50 फीसदी पद बैचवाइज आधार पर भरे जाने का प्रावधान है और इससे वर्षों से बैचवाइज चयन का इंतजार कर रहे पुराने उम्मीदवारों को नुकसान होगा। याचिकाकर्ता के मुताबिक, जब तक आरएंडपी नियमों में संशोधन नहीं किया जाता, तब तक सरकार कार्यकारी निर्देशों के माध्यम से चयन का तरीका नहीं बदल सकती।
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