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Himachal: हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा- पैरोल से इन्कार ठोस सबूतों पर आधारित होना चाहिए, निराधार आशंकाओं पर नहीं
Tue, 03 Jun 2025 05:00 AM IST
अंकेश डोगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Tue, 03 Jun 2025 05:00 AM IST
सार
Himachal High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल से इन्कार ठोस सबूतों पर आधारित होना चाहिए, न कि निराधार आशंकाओं पर। हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर...
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कैदियों की पैरोल अर्जियों को निपटाने में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताई है। खंडपीठ ने राज्य सरकार को 15 जुलाई 2025 तक पैरोल संबंधी नियमों में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए हैं, जिससे एक मजबूत व्यवस्था स्थापित हो सके। यह फैसला न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश राकेश कैंथला की खंडपीठ ने मोहन लाल बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में दिया है।
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खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि पहली बार पैरोल के लिए एक साल की वास्तविक कैद की गणना में कैदी की ओर से अंडर ट्रायल के रूप में बिताई गई अवधि को भी शामिल किया जाएगा। पहले कई मामलों में यह अवधि नहीं गिनी जाती थी, जिससे कैदियों को अनुचित रूप से पैरोल से वंचित रहना पड़ता था। पैरोल से इन्कार ठोस सबूतों पर आधारित होना चाहिए, न कि निराधार आशंकाओं पर। अदालत ने कहा कि सरकारी खामियों और आवेदन निपटाने में देरी के कारण अदालतों में बड़ी संख्या में रिट याचिकाएं आ रही हैं। इससे न्यायपालिका का बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा है।
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याचिकाकर्ता हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है, जिसने जेल प्रशासन से 30 दिन की पैरोल के लिए आवेदन किया था। संबंधित अधिकारियों ने इसे अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की पैरोल अर्जी पर फैसला आने में लगभग पांच महीने लग गए। नियमों के तहत इसकी समय-सीमा निर्धारित की है। अधिकारियों की लापरवाही और असंवेदनशील रवैये के कारण बड़ी संख्या में कैदियों को पैरोल के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए
खंडपीठ ने शीर्ष अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि आवेदन प्रक्रिया के लिए निर्धारित समय-सीमा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए एक निगरानी तंत्र विकसित किया जाए। अधिनियम, नियमों और जेल मैनुअल में विसंगतियों को दूर किया जाए। समय-सीमा का पालन न करने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। एक साथ पैरोल पर छोड़े जाने वाले सह-दोषियों के प्रतिशत और उनकी पात्रता के संबंध में भी स्पष्ट प्रावधान बनाए जाएं। खासकर जघन्य अपराधों के मामलों में। पैरोल आवेदनों को ट्रैक करने और मासिक स्थिति रिपोर्ट जारी करने के लिए एक तंत्र, सॉफ्टवेयर विकसित किया जाए।
खंडपीठ ने शीर्ष अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि आवेदन प्रक्रिया के लिए निर्धारित समय-सीमा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए एक निगरानी तंत्र विकसित किया जाए। अधिनियम, नियमों और जेल मैनुअल में विसंगतियों को दूर किया जाए। समय-सीमा का पालन न करने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। एक साथ पैरोल पर छोड़े जाने वाले सह-दोषियों के प्रतिशत और उनकी पात्रता के संबंध में भी स्पष्ट प्रावधान बनाए जाएं। खासकर जघन्य अपराधों के मामलों में। पैरोल आवेदनों को ट्रैक करने और मासिक स्थिति रिपोर्ट जारी करने के लिए एक तंत्र, सॉफ्टवेयर विकसित किया जाए।