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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Himachal High Court: Home Guard volunteers not entitled to pension and retirement benefits; petitions dismisse

हिमाचल हाईकोर्ट: होमगार्ड स्वयंसेवकों को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ का अधिकार नहीं, याचिकाएं खारिज

Thu, 10 Sep 2026 07:25 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 10 Sep 2026 07:25 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने राज्य के होमगार्ड स्वयंसेवकों के नियमितीकरण, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को लेकर दायर अलग-अलग याचिकाओं को खारिज कर दिया है। 

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Himachal High Court: Home Guard volunteers not entitled to pension and retirement benefits; petitions dismisse
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के होमगार्ड स्वयंसेवकों के नियमितीकरण, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को लेकर दायर अलग-अलग याचिकाओं को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक सेवा देने के बाद सामान्य रूप से सेवामुक्त होने वाले होमगार्ड स्वयंसेवकों को पेंशन, ग्रेच्युटी या अन्य सेवानिवृत्ति वित्तीय लाभ पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। साथ ही कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जो कानूनी विवाद पहले ही सुप्रीम कोर्ट तक जाकर अंतिम रूप से तय हो चुका है, उसे किसी वेलफेयर एसोसिएशन या नए नाम का मुखौटा पहनकर दोबारा नहीं खोला जा सकता।

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मामले के अनुसार रमेश चंद और अन्य याचिकाकर्ताओं को होमगार्ड संस्थान में बतौर वॉलंटियर शामिल किया गया था, जो करीब 40 साल की सेवा के बाद 2019-2020 में बिना किसी सेवानिवृत्ति लाभ के सेवामुक्त कर दिए गए। उन्होंने 2021 में कोर्ट में पहली याचिका दायर की थी। करीब 25 होमगार्ड्स ने सबसे पहले हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में नियमितीकरण और पेंशन के लिए मुकदमा किया था। ट्रिब्यूनल ने 2005 में इन मांगों को खारिज किया। इसके बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 2008 और देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट 2015 ने भी इस खारिज आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी थी।
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पुराने मुकदमों के इतिहास को छुपाते हुए एचपी होमगार्ड्स वेलफेयर एसोसिएशन के बैनर तले दोबारा वही मांगें लेकर नई रिट याचिका दाखिल कि गई थीं। अब हाईकोर्ट ने याचिकाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया। खंडपीठ ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केवल मुकदमों की शब्दावली या याचिकाकर्ता का नाम बदल देने से मूल विवाद नहीं बदल जाता। जब नियमितीकरण, ईपीएफ, ग्रुप इंश्योरेंस और पेंशन की मांगें हुबहू समान हैं और वे पहले ही सुप्रीम कोर्ट से हार चुके हैं, तो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के तहत यह केस दोबारा चलाने योग्य ही नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर अपने पुराने मुकदमों की हार के तथ्य को छुपाया।

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