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Himachal Pradesh: हिमाचल में पहाड़ी गाय गौरी के अस्तित्व पर संकट, दस हजार ही रह गई इस नस्ल की गायों की संख्या

Sun, 15 Jun 2025 11:12 AM IST
अंकेश डोगरा विकास चौधरी, संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
विकास चौधरी, संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना Published by: अंकेश डोगरा Updated Sun, 15 Jun 2025 11:12 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश में पहाड़ी गाय जिसे गौरी भी कहा जाता है इसके अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। आज इस नस्ल की संख्या घटकर 10,000 के आसपास रह गई है।

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Himachal existence of the hill cow Gauri is in danger number of this breed has reduced to only ten thousand
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में भोलू नस्ल की गाय पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। इसे पहाड़ी गाय और गौरी भी कहा जाता है। प्रदेश के बिलासपुर जिले में करीब 128 साल पहले शुरू हुए नलवाड़ मेले में इस गाय की खासियत का पता चला। यह गाय दूध के लिए मशहूर है। आधुनिकता के दौर में इस नस्ल की गायों की संख्या तेजी से घटी है।

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चंबा, कांगड़ा, किन्नौर, कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर, लाहौल-स्पीति में खेती और माल ढुलाई में भी इस नस्ल के गोवंश का उपयोग किया जाता है। इस नस्ल की गाय की दूध की मात्रा देसी गाय के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक है। करीब 50 वर्ष पहले इस नस्ल की संख्या पूरे प्रदेश में तेजी से बढ़ी। लोगों ने खेती और दूध उत्पादन को बढ़ाने में इस नस्ल का पालन करना बेहतर समझा।
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प्रदेश में इस नस्ल की संख्या एक लाख के करीब पहुंच गई। इसके बाद खेती और दूध उत्पादन तकनीक में बदलाव आते गए। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल और दूध उत्पादन में अन्य कई गुना अधिक उत्पादन देने वाली गायों की नस्ल आ गईं। लोगों के घटते रुझान के बीच पहाड़ी गाय के बचाव को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। आज इस नस्ल की संख्या घटकर 10,000 के आसपास रह गई हैं। अभी सिरमौर, सोलन, शिमला, बिलासपुर और मंडी के केवल दुर्गम इलाकों में इस नस्ल का पालन हो रहा है।

नलवाड़ मेले से शुरू हुआ पहाड़ी गाय का दौर
बिलासपुर के नलवाड़ मेले से पहाड़ी गाय का दौर शुरू हुआ। इस मेले में प्रदेश की देसी गाय और हरियाणा के बिलाही नस्ल के बैल में क्रॉस ब्रीडिंग करने से भोलू प्रजाति का जन्म हुआ। देसी गाय एक से डेढ़ लीटर दूध देती है और भोलू गाय का दूध उत्पादन ढाई से तीन लीटर रहा। दूध उत्पादन में यह नस्ल अधिक फायदेमंद साबित हुई। इसके अलावा खेती करने में भी इसका उपयोग किया जाता था।

भोलू नस्ल पहाड़ी इलाकों के लिहाज से एक शानदार नस्ल है। प्रदेश के किसानों और पशुपालकों का इस नस्ल ने कई सालों तक साथ दिया। इसके संरक्षण को लेकर कोई प्रयास धरातल पर नहीं हुए। -डॉ. उपिंद्र शर्मा, सेवानिवृत्त उपनिदेशक पशुपालन विभाग
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