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Hamirpur (Himachal) News: प्राकृतिक खेती से मृदा भी स्वस्थ, पैदावार में 20 फीसदी की बढ़ोतरी
Sun, 06 Oct 2024 08:11 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Sun, 06 Oct 2024 08:11 AM IST
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नेरी कॉलेज के विद्यार्थी प्राकृतिक खेती का कार्य करते। -संवाद
रंगस (हमीरपुर)। औद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय नेरी के मृदा विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने प्राकृतिक खेती के फायदों का खुलासा किया है। उनके शोध से पता चला है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है और मिट्टी भी स्वस्थ रहती है।
मृदा विज्ञान में पीएचडी की शोधार्थी अंकिता शर्मा के अनुसार प्राकृतिक खेती से कृषि योग्य मिट्टी में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा सुनिश्चित होती है। इससे मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार होता है। जब मिट्टी में देसी खाद का प्रयोग किया जाता है तो रासायनिक खाद और कीटनाशकों का दुष्प्रभाव भी कम हो जाता है।
शोध के दौरान अंकिता और उनके सहयोगियों ने फील्ड में बेड्स बनाकर वर्मी कंपोस्ट और जीवामृत का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में गोबर से तैयार जीवामृत, बीजा अमृत, घन जीवा अमृत, अछादन और बापसा का विशेष महत्व होता है। इस शोध में फूलगोभी पर ट्रायल किया जा रहा है। फ्रेंच बीन पर ट्रायल किया जा चुके हैं, जिसमें प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम मिले हैं।
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ट्रायल के दौरान प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर मिट्टी में जहां भौतिक सुधार देखने को मिला है वहीं रासायनिक व जैविक गुण और पैदावार भी बढ़ी है। फसल के लिए सकारात्मक वातावरण भी विकसित हुआ है और पानी धारण करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है।
मृदा विज्ञान विभाग के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ राकेश शर्मा के मार्गदर्शन में शोध का कार्य शुरू किया गया है उसी के तहत फील्ड में जाकर प्राकृतिक खेती के लिए भूमि को तैयार करके उसके ऊपर ट्रायल के तौर पर अनेकों शोध कार्य करके डाटा एकत्र किया जा रहा है। महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. धर्मपाल शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक खेती पर अधिक शोध करना आवश्यक है और इसके निष्कर्षों को किसानों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
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मृदा विज्ञान में पीएचडी की शोधार्थी अंकिता शर्मा के अनुसार प्राकृतिक खेती से कृषि योग्य मिट्टी में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा सुनिश्चित होती है। इससे मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार होता है। जब मिट्टी में देसी खाद का प्रयोग किया जाता है तो रासायनिक खाद और कीटनाशकों का दुष्प्रभाव भी कम हो जाता है।
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शोध के दौरान अंकिता और उनके सहयोगियों ने फील्ड में बेड्स बनाकर वर्मी कंपोस्ट और जीवामृत का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में गोबर से तैयार जीवामृत, बीजा अमृत, घन जीवा अमृत, अछादन और बापसा का विशेष महत्व होता है। इस शोध में फूलगोभी पर ट्रायल किया जा रहा है। फ्रेंच बीन पर ट्रायल किया जा चुके हैं, जिसमें प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम मिले हैं।
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ट्रायल के दौरान प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर मिट्टी में जहां भौतिक सुधार देखने को मिला है वहीं रासायनिक व जैविक गुण और पैदावार भी बढ़ी है। फसल के लिए सकारात्मक वातावरण भी विकसित हुआ है और पानी धारण करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है।
मृदा विज्ञान विभाग के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ राकेश शर्मा के मार्गदर्शन में शोध का कार्य शुरू किया गया है उसी के तहत फील्ड में जाकर प्राकृतिक खेती के लिए भूमि को तैयार करके उसके ऊपर ट्रायल के तौर पर अनेकों शोध कार्य करके डाटा एकत्र किया जा रहा है। महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. धर्मपाल शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक खेती पर अधिक शोध करना आवश्यक है और इसके निष्कर्षों को किसानों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।