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Hamirpur (Himachal) News: आधुनिकता की दौड़ में सिकुड़ा कुम्हार बाजार
Wed, 11 Mar 2026 01:00 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Wed, 11 Mar 2026 01:00 AM IST
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सुजानपुर मेले में मिट्टी के बर्तन लेकर पहुंचे रविंद्र कुमार। संवाद
सुजानपुर (हमीरपुर)। आधुनिकता की दौड़ में सुजानपुर के होली मेले में लगने वाला कुम्हार बाजार सिकुड़ता जा रहा है। पहले जहां सुजानपुर में सजने वाले होली मेले में विभिन्न स्थानों से 15 से 20 प्रजापति श्रद्धालु अपने मिट्टी के बर्तन सजाने के लिए आते थे, वहीं अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है।
समय परिवर्तन के साथ साथ बाजार में मिट्टी के बर्तनों के स्थान पर प्लास्टिक व अन्य धातुओं से बने उत्पादों ने अपनी जगह बना ली है, जिससे प्रजापतियों की पीढ़ी इस काम को आगे बढ़ाने में अधिक रूचि नहीं दिखा रही है। गर्मियों के मौसम में प्रजापति मिट्टी के घड़े, सुराही के अलावा अन्य उत्पाद भी बनाते थे, जिसकी अब बहुत कम मांग रह गई है।
इसके अलावा बर्तन बनाने के लिए मिट्टी की कमी और पूरा मेहनताना न मिलना भी प्रजापति पीढ़ी का दूर होना भी मुख्य कारण है। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करने वाले लोगों का कहना है कि पहले बर्तन बनाने के लिए मिट्टी आसपास के क्षेत्र में आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया।
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इसके साथ ही पंजाब से भी लोग मिट्टी के बर्तन लेकर हिमाचल पहुंच रहे हैं। इससे भी स्थानीय बर्तनों और घड़ों की मांग कम हो गई है। इन लोगों के अनुसार हिमाचल और पंजाब की मिट्टी में काफी अंतर है। ऐसे में हमीरपुर और बिलासपुर के क्षेत्र में उम्दा मिट्टी मिलती है, लेकिन अब इसे खरीदना पड़ता है जबकि पहले यह निशुल्क उपलब्ध होती थी। इसके अलावा बढ़ते दामों के कारण भी लोग इनकी खरीदारी कम करते हैं।
मेले में दुकान करने पहुंचे रविंद्र कुमार ने बताया कि वह अपने पूर्वजों की विरासत को संभाल रहे हैं, लेकिन अब इन बर्तनों की मांग कम हो गई है। अब प्लास्टिक और अन्य धातुओं का प्रयोग होने से इनके व्यापार पर असर पड़ा है। इसके अलावा बाहरी राज्यों से भी लोग बर्तन बेचने के लिए आ रहे हैं । मिट्टी के बर्तन बनाना पहले से अधिक महंगा हो गया है। पहले सुजानपुर मेले में 15 से 20 लोग मेला लगाने के लिए आते थे, लेकिन अब मैं अकेला ही रह गया हूं। संवाद
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समय परिवर्तन के साथ साथ बाजार में मिट्टी के बर्तनों के स्थान पर प्लास्टिक व अन्य धातुओं से बने उत्पादों ने अपनी जगह बना ली है, जिससे प्रजापतियों की पीढ़ी इस काम को आगे बढ़ाने में अधिक रूचि नहीं दिखा रही है। गर्मियों के मौसम में प्रजापति मिट्टी के घड़े, सुराही के अलावा अन्य उत्पाद भी बनाते थे, जिसकी अब बहुत कम मांग रह गई है।
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इसके अलावा बर्तन बनाने के लिए मिट्टी की कमी और पूरा मेहनताना न मिलना भी प्रजापति पीढ़ी का दूर होना भी मुख्य कारण है। मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करने वाले लोगों का कहना है कि पहले बर्तन बनाने के लिए मिट्टी आसपास के क्षेत्र में आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया।
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इसके साथ ही पंजाब से भी लोग मिट्टी के बर्तन लेकर हिमाचल पहुंच रहे हैं। इससे भी स्थानीय बर्तनों और घड़ों की मांग कम हो गई है। इन लोगों के अनुसार हिमाचल और पंजाब की मिट्टी में काफी अंतर है। ऐसे में हमीरपुर और बिलासपुर के क्षेत्र में उम्दा मिट्टी मिलती है, लेकिन अब इसे खरीदना पड़ता है जबकि पहले यह निशुल्क उपलब्ध होती थी। इसके अलावा बढ़ते दामों के कारण भी लोग इनकी खरीदारी कम करते हैं।
मेले में दुकान करने पहुंचे रविंद्र कुमार ने बताया कि वह अपने पूर्वजों की विरासत को संभाल रहे हैं, लेकिन अब इन बर्तनों की मांग कम हो गई है। अब प्लास्टिक और अन्य धातुओं का प्रयोग होने से इनके व्यापार पर असर पड़ा है। इसके अलावा बाहरी राज्यों से भी लोग बर्तन बेचने के लिए आ रहे हैं । मिट्टी के बर्तन बनाना पहले से अधिक महंगा हो गया है। पहले सुजानपुर मेले में 15 से 20 लोग मेला लगाने के लिए आते थे, लेकिन अब मैं अकेला ही रह गया हूं। संवाद