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Hamirpur (Himachal) News: हर्षोल्लास से मनाई ईद, सामूहिक भोज कर दिया भाईचारे का संदेश
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नादौन में गले मिलकर ईद मनाते बच्चे। संवाद
रंगस (हमीरपुर)। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने लगातार 30 दिन तक निराधार रोजे रखने के बाद वीरवार के दिन हर्षोल्लास से मीठी ईद मनाई। रोजे का पहला दिन 11 मार्च से शुरू हुआ। 10 अप्रैल को 30 दिन पूरे होने के बाद रोजे के समापन के दूसरे दिन यानी वीरवार को रंगस क्षेत्र में ईद का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। प्रतिदिन रोजे की प्रक्रिया शहरी (सुबह का नाश्ता) के बाद शुरू होकर शाम को सूर्य अस्त होने के समय पर रोजा नवाज अदा कर खोला जाता है। यह प्रक्रिया पूरा माह चलने के बाद ही ईद के रूप में मुस्लिम समुदाय के लोग इस त्योहार को खुशी-खुशी मनाते हैं। रोजे रखने के 30वें दिन चांद का दीदार होने पर ही रोजों का समापन होता है। ऑल इंडिया गुर्जर महासभा हिमाचल प्रांत के उपाध्यक्ष जान मोहम्मद, फांदी खान, इस्लामदीन, पुट्टूदीन व नजीर मोहम्मद आदि ने कहा कि वीरवार के दिन नवाज अदा करने के बाद एक दूसरे को गले लगा कर ईद की मुबारकबाद देने के साथ ही गांव बन्ह व आसपास के सभी लोगों ने गांव में बैठकर सामूहिक रूप से भोज किया। इससे समुदाय के लोगों में आपसी भाईचारा बढ़ा। वहीं, आपसी मनमुटाव भी दूर हुआ। उन्होंने कहा कि ईद के दिन रोजे यानी व्रत खोलने पर मीठा पकवान खाने के उपरांत ही खाना वगैरह खाया जाता है। इसलिए इस त्योहार को मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है। ईद के त्योहार के दिन सबसे मुख्य बात यही होती है कि इस दिन समुदाय के गरीब लोगों को सदका यानी जान माल का फितरामा और जकात दी जाती है।
यही नहीं समुदाय का काम, धंधा या नौकरी करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी साल भर की कमाई का अढाई प्रतिशत हिस्सा गरीबों में आर्थिक मदद के तौर पर देता है। इसे जकात कहा जाता है। इसी तरह मीठी ईद के ठीक अढ़ाई माह के बाद बकरीद का आयोजन त्योहार के रूप में किया जाता है। इसमें कुर्बानी के नाम से बकरा आदि की कुर्बानी दी जाती है। इसे बाद में पकाकर सामूहिक भोज के तौर पर इकट्ठे बैठकर खाने में खाया जाता है। वर्षभर में मुस्लिम समुदाय के मीठी ईद और बकरीद नाम के दो ही बड़े त्योहार होते हैं। इसमें मुस्लिम समुदाय के लोग छोटे-मोटे मनमुटाव को भुलाकर एक दूसरे के गले से लगकर भाईचारे का संदेश देकर मनाते हैं।
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यही नहीं समुदाय का काम, धंधा या नौकरी करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी साल भर की कमाई का अढाई प्रतिशत हिस्सा गरीबों में आर्थिक मदद के तौर पर देता है। इसे जकात कहा जाता है। इसी तरह मीठी ईद के ठीक अढ़ाई माह के बाद बकरीद का आयोजन त्योहार के रूप में किया जाता है। इसमें कुर्बानी के नाम से बकरा आदि की कुर्बानी दी जाती है। इसे बाद में पकाकर सामूहिक भोज के तौर पर इकट्ठे बैठकर खाने में खाया जाता है। वर्षभर में मुस्लिम समुदाय के मीठी ईद और बकरीद नाम के दो ही बड़े त्योहार होते हैं। इसमें मुस्लिम समुदाय के लोग छोटे-मोटे मनमुटाव को भुलाकर एक दूसरे के गले से लगकर भाईचारे का संदेश देकर मनाते हैं।
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