Dharamshala: चुगलाखांग मठ में दलाई लामा के सम्मान में जुटे हजारों तिब्बती, जानें विस्तार से
मैक्लोडगंज स्थित चुगलाखांग मठ में दलाई लामा के तिब्बत का आध्यात्मिक और लौकिक नेतृत्व ग्रहण करने की 75वीं वर्षगांठ पर हजारों तिब्बतियों और अतिथियों ने दलाई लामा का आभार व्यक्त किया। पढ़ें पूरी खबर...
विस्तार
दलाई लामा के तिब्बत का आध्यात्मिक और लौकिक नेतृत्व ग्रहण करने की 75वीं वर्षगांठ पर मैक्लोडगंज स्थित चुगलाखांग मठ में विशेष समारोह आयोजित किया गया। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में हजारों तिब्बतियों और अतिथियों ने दलाई लामा का आभार व्यक्त किया। समारोह में दलाई लामा भी मौजूद रहे।
कार्यक्रम में चेक गणराज्य की राजदूत डॉ. एलीस्का जिगोवा और विदेश मंत्रालय के लायजन अधिकारी यशबीर सिंह बतौर मुख्यअतिथि शामिल हुए। इस अवसर पर पूर्व लायजन अधिकारियों और उन डीएसपी अधिकारियों ने भी शिरकत की जिन्होंने धर्मशाला में दलाई लामा कार्यालय में वर्षों तक सेवाएं दी हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत तिब्बती मुख्य न्याय आयुक्त येशी वांगमो, निर्वासित तिब्बती संसद के स्पीकर खेनपो सोनम तेनदेल और सिक्योंग एवं प्रधानमंत्री पेंपा सेरिंग द्वारा मंडल अर्पण तथा बुद्ध के शरीर, वचन और मन के प्रतीकों के समर्पण से हुई। इसके बाद पूर्व सांसद ताशी नामग्याल ने तिब्बती स्कूलों के पूर्व छात्रों की ओर से मंडल अर्पण किया। कार्यक्रम में भारत और नेपाल के तिब्बती विद्यालयों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
इस अवसर पर सिक्योंग पेंपा सेरिंग और स्पीकर सोनम तेनदेल ने मंत्रिमंडल और निर्वासित संसद के वक्तव्य प्रस्तुत किए। वक्तव्यों में 16 वर्ष की आयु से दलाई लामा के दूरदर्शी नेतृत्व, चीन-तिब्बत मसले के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों, मिडिल वे नीति और तिब्बती लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास में उनके योगदान का उल्लेख किया गया।
कार्यक्रम में बच्चों ने दलाई लामा के करुणामय नेतृत्व को समर्पित कृतज्ञता गीत गाया। कार्यक्रम में भारत से 1959 से मिल रहे सहयोग के लिए स्मृति-पट्ट भेंट किया गया जिसे केंद्र सरकार की ओर से यशबीर सिंह ने स्वीकार किया। इस मौके पर ओएचएचडीएल के सचिव लोबसंग जिन्पा की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इसके बाद तिब्बती स्कूलों के छात्रों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।
डॉ. एलीस्का जिगोवा ने कहा कि किसी भी परिवार, संस्था या राष्ट्र की समृद्धि के लिए योग्य नेतृत्व आवश्यक है। 1950 में केवल 16 वर्ष की आयु में कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व संभालने वाले दलाई लामा का नेतृत्व अद्वितीय है। उन्होंने बताया कि दलाई लामा ने 1959 के निर्वासन के दौरान भी बच्चों को साथ रखा। 1960 से विद्यालयों की स्थापना कर उनके भविष्य को सुरक्षित किया।