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Chamba News: खड्डी पर चंबा की विरासत बुन रहीं रीना, बेटियों को दे रहीं हुनर
Mon, 05 Oct 2026 10:34 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Mon, 05 Oct 2026 10:34 PM IST
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होली में लड़कियों को खड्डी पर चंबा शॉल तैयार करने का प्रशिक्षण देती रीना राणा : संवाद
15 साल से चंबा शॉल के काम से जुड़ीं रीना राणा, आत्मनिर्भर बनने के बाद करीब 30 युवतियों को सिखा चुकीं कला
10 युवतियों को दे रहीं प्रशिक्षण, घर और खेती की जिम्मेदारियों के साथ पारंपरिक हुनर को बना रहीं रोजगार का जरिया
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। खड्डी पर दौड़ते धागों के बीच रीना राणा केवल चंबा शॉल नहीं बुन रहीं, बल्कि जिले की पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी कर रही हैं।
होली की रहने वाली रीना पिछले 15 वर्षों से चंबा शॉल और खड्डी के काम से जुड़ी हैं। इस हुनर ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया तो उन्होंने इसे अपने तक सीमित रखने के बजाय गांव की बेटियों को भी इससे जोड़ने का फैसला किया।
रीना ने अपने वर्षों के अनुभव से चंबा शॉल तैयार करने की बारीकियां सीखीं। इसके बाद उन्होंने युवतियों को खड्डी पर काम करने और शॉल तैयार करने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। अब तक वह करीब 30 लड़कियों को इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। वर्तमान में 10 युवतियां उनसे प्रशिक्षण ले रही हैं। उनका प्रयास है कि चंबा की पहचान से जुड़ी यह कला लुप्त न हो और नई पीढ़ी इसे सीखकर रोजगार का साधन बना सके।
रीना ने बताया कि खड्डी के काम के साथ वह खेती-बाड़ी भी करती हैं। घर और खेत की जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने चंबा शॉल के हुनर को अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया। परिवार में पति और दो बेटे हैं। अब वह अपने अनुभव से दूसरी बेटियों को भी हुनरमंद और आत्मनिर्भर बनाने में जुटी हैं।
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रीना का कहना है कि पारंपरिक हुनर केवल विरासत नहीं, बल्कि रोजगार का मजबूत साधन भी है। लड़कियां इस कला को सीखकर घर से ही काम शुरू कर सकती हैं और अपनी आय का जरिया बना सकती हैं। उनका उद्देश्य चंबा की इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के साथ अधिक से अधिक युवतियों को इससे जोड़ना है।
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10 युवतियों को दे रहीं प्रशिक्षण, घर और खेती की जिम्मेदारियों के साथ पारंपरिक हुनर को बना रहीं रोजगार का जरिया
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। खड्डी पर दौड़ते धागों के बीच रीना राणा केवल चंबा शॉल नहीं बुन रहीं, बल्कि जिले की पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी कर रही हैं।
होली की रहने वाली रीना पिछले 15 वर्षों से चंबा शॉल और खड्डी के काम से जुड़ी हैं। इस हुनर ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया तो उन्होंने इसे अपने तक सीमित रखने के बजाय गांव की बेटियों को भी इससे जोड़ने का फैसला किया।
रीना ने अपने वर्षों के अनुभव से चंबा शॉल तैयार करने की बारीकियां सीखीं। इसके बाद उन्होंने युवतियों को खड्डी पर काम करने और शॉल तैयार करने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। अब तक वह करीब 30 लड़कियों को इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। वर्तमान में 10 युवतियां उनसे प्रशिक्षण ले रही हैं। उनका प्रयास है कि चंबा की पहचान से जुड़ी यह कला लुप्त न हो और नई पीढ़ी इसे सीखकर रोजगार का साधन बना सके।
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रीना ने बताया कि खड्डी के काम के साथ वह खेती-बाड़ी भी करती हैं। घर और खेत की जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने चंबा शॉल के हुनर को अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाया। परिवार में पति और दो बेटे हैं। अब वह अपने अनुभव से दूसरी बेटियों को भी हुनरमंद और आत्मनिर्भर बनाने में जुटी हैं।
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रीना का कहना है कि पारंपरिक हुनर केवल विरासत नहीं, बल्कि रोजगार का मजबूत साधन भी है। लड़कियां इस कला को सीखकर घर से ही काम शुरू कर सकती हैं और अपनी आय का जरिया बना सकती हैं। उनका उद्देश्य चंबा की इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के साथ अधिक से अधिक युवतियों को इससे जोड़ना है।