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सचूईं के शिव चेलों की अनुमति पर ही मणिमहेश की यात्रा पर जा रहे श्रद्धालु
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चौरासी मंदिर परिसर में नृत्य करता भद्रवाह से आया श्रद्धालुओं का जत्था। संवाद
- फोटो : Chamba
भरमौर (चंबा)। सचूईं के शिव चेले चौरासी मंदिर परिसर में स्थित मणिमहेश मंदिर की चौखट के बाहर मणिमहेश यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दे रहे हैं। सचूईं के चेलों की अनुमति मिलने के बाद ही श्रद्धालु मणिमहेश की यात्रा पर जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जिलों डोडा, किश्तवाड़, भद्रवाह के शिव भक्त हर साल काफी संख्या में मणिमहेश की यात्रा जाते हैं। शिव चेलों की अनुमति न मिलने पर श्रद्धालु यात्रा पर नहीं जाते हैं। ये परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पवित्र मणिमहेश यात्रा के बडे़ शाही स्नान से पहले यात्रा करने वाले श्रद्धालु सचूईं के शिव चेले से आशीर्वाद और यात्रा की अनुमति लेना नहीं भूलते हैं। ये परंपरा सदियों से चली आ रही है। चौरासी परिसर स्थित मणिमहेश मंदिर के चौखट के बाहर बैठे शिव चेले श्रद्धालुओं को सफल यात्रा और सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
मान्यता है कि भगवान शंकर ने सचूईं गांव के त्रिलोचन को वरदान दिया है कि उसके वंशज शिव भक्तों को जो आशीर्वाद देंगे वे अवश्य पूर्ण होगा। मणिमहेश यात्रा के बडे़ स्नान से चार दिन पूर्व शिव चेले (गुर) मणिमहेश मंदिर के बाहर बैठते हैं। तीसरे दिन चौरासी की परिक्रमा करने के उपरांत डल झील को कूच करते हैं। सप्तमी के दिन डल झील पार करने (डल तोड़ने) के बाद आम श्रद्धालु पवित्र मणिमहेश डल झील में आस्था की डुबकी लगाना आरंभ करते हैं। ये क्रम राधा अष्टमी के समापन तक चलता है।
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इनसेट
दशनामी अखाड़ा चंबा से छड़ी हड़सर रवाना
बुधवार को चौरासी परिसर स्थित पवित्र मणिमहेश मंदिर से महंत यतिंद्र गिरि साधु-संतों के साथ अपने अगले पड़ाव हड़सर को रवाना हुई। राधा अष्टमी से पूर्व यह छड़ी मणिमहेश डल झील पहुंचेगी। छड़ी के पवित्र डल में डुबकी के साथ ही बड़ा शाही स्नान आरंभ होगा।
इनसेट
पड़ोसी राज्य जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह, डोडा, किश्तवाड़ से आने वाले श्रद्धालु चौरासी परिसर में रुकने के बाद अगले पड़ाव हड़सर को कूच करते हैं। हड़सर जाने से पूर्व श्रद्धालु भरमाणी माता, चौरासी मंदिर के दर्शन करने के बाद चौरासी पीठ पर नाटी डालकर ही आगे की यात्रा पर रवाना होते हैं।
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पवित्र मणिमहेश यात्रा के बडे़ शाही स्नान से पहले यात्रा करने वाले श्रद्धालु सचूईं के शिव चेले से आशीर्वाद और यात्रा की अनुमति लेना नहीं भूलते हैं। ये परंपरा सदियों से चली आ रही है। चौरासी परिसर स्थित मणिमहेश मंदिर के चौखट के बाहर बैठे शिव चेले श्रद्धालुओं को सफल यात्रा और सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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मान्यता है कि भगवान शंकर ने सचूईं गांव के त्रिलोचन को वरदान दिया है कि उसके वंशज शिव भक्तों को जो आशीर्वाद देंगे वे अवश्य पूर्ण होगा। मणिमहेश यात्रा के बडे़ स्नान से चार दिन पूर्व शिव चेले (गुर) मणिमहेश मंदिर के बाहर बैठते हैं। तीसरे दिन चौरासी की परिक्रमा करने के उपरांत डल झील को कूच करते हैं। सप्तमी के दिन डल झील पार करने (डल तोड़ने) के बाद आम श्रद्धालु पवित्र मणिमहेश डल झील में आस्था की डुबकी लगाना आरंभ करते हैं। ये क्रम राधा अष्टमी के समापन तक चलता है।
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दशनामी अखाड़ा चंबा से छड़ी हड़सर रवाना
बुधवार को चौरासी परिसर स्थित पवित्र मणिमहेश मंदिर से महंत यतिंद्र गिरि साधु-संतों के साथ अपने अगले पड़ाव हड़सर को रवाना हुई। राधा अष्टमी से पूर्व यह छड़ी मणिमहेश डल झील पहुंचेगी। छड़ी के पवित्र डल में डुबकी के साथ ही बड़ा शाही स्नान आरंभ होगा।
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पड़ोसी राज्य जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह, डोडा, किश्तवाड़ से आने वाले श्रद्धालु चौरासी परिसर में रुकने के बाद अगले पड़ाव हड़सर को कूच करते हैं। हड़सर जाने से पूर्व श्रद्धालु भरमाणी माता, चौरासी मंदिर के दर्शन करने के बाद चौरासी पीठ पर नाटी डालकर ही आगे की यात्रा पर रवाना होते हैं।