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भरमौर में नहीं जलाया जाता रावण का पूतला
Updated Sat, 30 Sep 2017 10:27 PM IST
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भरमौर (चंबा)।
देश के विभिन्न हिस्सों में जहां विजयदशमी का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है वहीं, प्रदेश की शिव नगरी भरमौर में रावण के पुतलों का दहन नहीं किया जाता है। रामलीला भी नहीं होती। मान्यता है कि रावण भगवान शंकर के परम भगत थे। जिसने शिव की भक्ति के लिए कैलाश पर्वत पर कड़ा तप किया था। भरमौर में भी पवित्र कैलाश पर्वत स्थित है। ऐसे में भरमौर में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है।
जनजातीय क्षेत्र भरमौर को शिव भगवान का निवास स्थान भी माना जाता है। रावण शिव भक्त होने के साथ एक महाज्ञानी ब्राह्मण भी था। भरमौर के चौरासी परिसर के साथ स्थित अर्द्धगंगा कुंड के साथ ही कपलेश्वर महादेव का मंदिर है। उस मंदिर के साथ ही दसमुखी की एक शिला भी है। जिस शिला को रावण के रूप में माना जाता है। इसी के चलते भरमौर में न तो नवरात्रों में रामलीला का मंचन होता है और न ही महानवमी पर रावण का दहन किया जाता है।
चौरासी मंदिर में धर्मराज मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा, पंडित हरिशरण शर्मा, पंडित सुरेश कुमार शर्मा और देसराज शर्मा ने बताया कि रावण भगवान शंकर का अनन्य भगत था। ऐसे में शिव स्थली भरमौर में रावण का दहन नहीं किया जाता। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा को देखते उन्हें भी पांच दशक हो चुके हैं।
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देश के विभिन्न हिस्सों में जहां विजयदशमी का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है वहीं, प्रदेश की शिव नगरी भरमौर में रावण के पुतलों का दहन नहीं किया जाता है। रामलीला भी नहीं होती। मान्यता है कि रावण भगवान शंकर के परम भगत थे। जिसने शिव की भक्ति के लिए कैलाश पर्वत पर कड़ा तप किया था। भरमौर में भी पवित्र कैलाश पर्वत स्थित है। ऐसे में भरमौर में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है।
जनजातीय क्षेत्र भरमौर को शिव भगवान का निवास स्थान भी माना जाता है। रावण शिव भक्त होने के साथ एक महाज्ञानी ब्राह्मण भी था। भरमौर के चौरासी परिसर के साथ स्थित अर्द्धगंगा कुंड के साथ ही कपलेश्वर महादेव का मंदिर है। उस मंदिर के साथ ही दसमुखी की एक शिला भी है। जिस शिला को रावण के रूप में माना जाता है। इसी के चलते भरमौर में न तो नवरात्रों में रामलीला का मंचन होता है और न ही महानवमी पर रावण का दहन किया जाता है।
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चौरासी मंदिर में धर्मराज मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा, पंडित हरिशरण शर्मा, पंडित सुरेश कुमार शर्मा और देसराज शर्मा ने बताया कि रावण भगवान शंकर का अनन्य भगत था। ऐसे में शिव स्थली भरमौर में रावण का दहन नहीं किया जाता। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा को देखते उन्हें भी पांच दशक हो चुके हैं।
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