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गलत निशानदेही के कारण फिर से लटकी विस्थापन की तलवार : देशराज
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नरसिंह मंदिर औहर में बैठक के दौरान ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित समिति के सदस्य।
- फोटो : BILASPUR
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भगेड़ (बिलासपुर)। गोविंद सागर झील के निर्माण के 61 वर्ष पूरे होने पर नरसिंह मंदिर औहर में रविवार को ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित समिति के प्रधान देशराज शर्मा की अध्यक्षता में बैठक हुई। गोविंद सागर के निर्माण दिवस पर 9 अगस्त को उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को समिति के माध्यम से ज्ञापन भेजने का निर्णय लिया गया।
समिति के अध्यक्ष देशराज शर्मा ने कहा कि वर्ष 1971 को पुनर्वास के नियम बनाए गए। बिलासपुर शहर और गांव के लिए अलग-अलग नियम तय किए गए। विस्थापन के बाद 1973 को कुछ ग्रामीण विस्थापितों का पुनर्वास किया गया। लोगों ने अपने आशियानें तो बना लिए लेकिन निशानदेही सही न होने के कारण जमीन कहीं और घर कहीं और जगह बने हैं। इस कारण आज इन लोगों पर दोबारा विस्थापित की तलवार लटक गई है। जमीनों को अवैध करार देकर सैकड़ों लोगों के बिजली-पानी के कनेक्शन काटे जा चुके हैं। बिलासपुर शहर में करीब 345 लोगों को प्लाट नहीं मिल पाए हैं। उन्होंने बताया कि आज तक जिला ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति की मांग पर भाखड़ा विस्थापित क्षेत्र का बंदोबस्त नहीं करवाया। विस्थापितों की कब्जे वाली जमीन का मलिकाना हक प्रदान नहीं किया है। जबकि क्षेत्र के विधायक ने कई बार मिनी सेटलमेंट करवाने की बात कही है।
उन्होंने कहा है कि मिनी सेटलमेंट के बाद विस्थापितों पर लटक रही दोबारा विस्थापित होने की तलवार सदा के लिए हट जाएगी। उन्होंने विस्थापितों के काटे गए कनेक्शनों को बहाल करने, विस्थापितों को मुफ्त में बिजली दिए जाने, विस्थापितों एवं प्रभावितों को झील से पेयजल व सिंचाई का पानी उपलब्ध करवाने, विस्थापितों के बच्चों को बीबीएमबी में नौकरियों में आरक्षण दिए जाने, रायल्टी के रूप में मिलने वाली राशि को विस्थापितों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर खर्च करने, जिन विस्थापितों को प्लाट नहीं मिले हैं उन्हें प्लाट दिए जाने, गोविंद सागर पर भजवाणी में पुल बनाने की मांग की है।
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बैठक में औहर, भजवानी, कल्लर इकाई का गठन किया गया। सर्वसम्मति से प्रकाश चंद को प्रधान, सतीश कुमार को उपप्रधान, मदनलाल को कोषाध्यक्ष, जगत राम शर्मा, वेद प्रकाश, रामस्वरूप, मजनू राम को कार्यकारिणी सदस्य चुना गया।
बाक्स
भजवाणी में राजाओं के समय बने पुल का मिट गया अस्तित्व
गोविंद सागर झील के अस्तित्व में आने से पहले राजाओं के समय भजवाणी में एकमात्र पुल था। इसका अस्तित्व गोविंद सागर झील बनने के बाद समाप्त हो गया। कहलूर रियासत के राजा अमरचंद ने वर्ष 1889 में इसका निर्माण करवाया था। उस समय इस पुल के निर्माण पर 28571 रुपये का खर्चा आया था।
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समिति के अध्यक्ष देशराज शर्मा ने कहा कि वर्ष 1971 को पुनर्वास के नियम बनाए गए। बिलासपुर शहर और गांव के लिए अलग-अलग नियम तय किए गए। विस्थापन के बाद 1973 को कुछ ग्रामीण विस्थापितों का पुनर्वास किया गया। लोगों ने अपने आशियानें तो बना लिए लेकिन निशानदेही सही न होने के कारण जमीन कहीं और घर कहीं और जगह बने हैं। इस कारण आज इन लोगों पर दोबारा विस्थापित की तलवार लटक गई है। जमीनों को अवैध करार देकर सैकड़ों लोगों के बिजली-पानी के कनेक्शन काटे जा चुके हैं। बिलासपुर शहर में करीब 345 लोगों को प्लाट नहीं मिल पाए हैं। उन्होंने बताया कि आज तक जिला ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति की मांग पर भाखड़ा विस्थापित क्षेत्र का बंदोबस्त नहीं करवाया। विस्थापितों की कब्जे वाली जमीन का मलिकाना हक प्रदान नहीं किया है। जबकि क्षेत्र के विधायक ने कई बार मिनी सेटलमेंट करवाने की बात कही है।
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उन्होंने कहा है कि मिनी सेटलमेंट के बाद विस्थापितों पर लटक रही दोबारा विस्थापित होने की तलवार सदा के लिए हट जाएगी। उन्होंने विस्थापितों के काटे गए कनेक्शनों को बहाल करने, विस्थापितों को मुफ्त में बिजली दिए जाने, विस्थापितों एवं प्रभावितों को झील से पेयजल व सिंचाई का पानी उपलब्ध करवाने, विस्थापितों के बच्चों को बीबीएमबी में नौकरियों में आरक्षण दिए जाने, रायल्टी के रूप में मिलने वाली राशि को विस्थापितों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर खर्च करने, जिन विस्थापितों को प्लाट नहीं मिले हैं उन्हें प्लाट दिए जाने, गोविंद सागर पर भजवाणी में पुल बनाने की मांग की है।
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बैठक में औहर, भजवानी, कल्लर इकाई का गठन किया गया। सर्वसम्मति से प्रकाश चंद को प्रधान, सतीश कुमार को उपप्रधान, मदनलाल को कोषाध्यक्ष, जगत राम शर्मा, वेद प्रकाश, रामस्वरूप, मजनू राम को कार्यकारिणी सदस्य चुना गया।
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भजवाणी में राजाओं के समय बने पुल का मिट गया अस्तित्व
गोविंद सागर झील के अस्तित्व में आने से पहले राजाओं के समय भजवाणी में एकमात्र पुल था। इसका अस्तित्व गोविंद सागर झील बनने के बाद समाप्त हो गया। कहलूर रियासत के राजा अमरचंद ने वर्ष 1889 में इसका निर्माण करवाया था। उस समय इस पुल के निर्माण पर 28571 रुपये का खर्चा आया था।