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Bilaspur News: जलमग्न मंदिरों को शिफ्ट करने की परियोजना धनाभाव में लटकी
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गोबिंद सागर झील से इन मंदिरों को लिफ्ट करने के लिए प्रस्तावित है 1500 करोड़ की परियोजना। संवाद
-गोबिंद सागर झील की परियोजना के लिए तैयार की गई है 1500 करोड़ की डीपीआर
-तीन चरणों में प्रस्तावित योजना के पहले चरण पर प्रदेश सरकार को देना था 105 करोड़
-सरकार बदलने के बाद दिल्ली के कार्यालयों में धूल फांक रही फाइल
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। गोबिंद सागर झील में भाखड़ा बांध बनने के बाद जलमग्न हुए ऐतिहासिक मंदिरों को पुनर्स्थापित करने की बहुप्रतीक्षित योजना धनाभाव में अधर में लटकी हुई है। 1500 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पहले चरण के लिए प्रदेश सरकार को 105 करोड़ रुपये की फंडिंग करनी थी। इसके बाद बाकी 1400 करोड़ रुपये की फंडिंग केंद्र सरकार को करनी थी। मगर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद यह योजना पूरी तरह ठप हो गई है। पहले चरण की फंडिंग नहीं होने के कारण परियोजना का काम शुरू नहीं हो सका। अगर राज्य सरकार पहली किस्त जारी कर देती है तो केंद्र सरकार ने बाकी फंडिंग का आश्वासन दिया था। पर्यटन विभाग ने पहले चरण के तहत मंदिरों को शिफ्ट करने के लिए डीपीआर तैयार कर एडीबी को फाइल भेजी थी। बीबीएमबी और पर्यटन विभाग से भी दोनों मॉड्यूल के लिए मंजूरी मिल चुकी थी। इसके तहत नाले के नौण क्षेत्र से गोपाल मंदिर समेत तीन मंदिरों को धौलरा में स्थानांतरित किया जाना था। मिट्टी के सैंपल भी पास हो चुके हैं और मंदिरों को लिफ्ट करने के लिए तकनीकी मॉडल तैयार हो गए हैं। बावजूद इसके, प्रदेश सरकार की पहली किस्त न जारी होने के कारण परियोजना लटक कर रह गई है।
भाजपा सरकार के कार्यकाल में इस परियोजना को लेकर जनता को बड़े आश्वासन दिए गए थे। केंद्र सरकार ने साफ किया था कि अगर प्रदेश सरकार पहले चरण के लिए 105 करोड़ रुपये की राशि जारी करती है तो शेष 1400 करोड़ रुपये इस परियोजना पर केंद्र खर्च करेगा। बताते चलें कि परियोजना के पहले चरण में नाले के नौण क्षेत्र से गोपाल मंदिर समेत तीन मंदिरों को धौलरा में स्थानांतरित करने, दूसरे चरण में सांडू मैदान को पर्यटन दृष्टि से विकसित करने, तीसरे चरण में मंडी भराड़ी के पास बैराज बनाकर मंदिरों के आसपास एक जलाशय का निर्माण करना शामिल है। इसमें रिवर फ्रंट और वॉक वेज का विकास भी प्रस्तावित है। जलमग्न मंदिरों में रंगनाथ, खुनमुखेश्वर, ठाकुरद्वारा, मुरली मनोहर, गोपाल मंदिर और हनुमान मंदिर शामिल हैं। दशकों से जलमग्न इन मंदिरों को पुनर्स्थापित करने की मांग स्थानीय लोगों की ओर से की जा रही है।
मंदिरों के शिफ्ट होने से न केवल लोगों की धार्मिक आस्था को बल मिलेगा, बल्कि यह क्षेत्र पर्यटन के लिए भी एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। वहीं हिमाचल प्रदेश रोड इन्फास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने डीपीआर बनाकर आगे भेज दी है। लेकिन अभी तक परियोजना की फाइल उससे आगे नहीं बढ़ी है।
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इनसेट
अगर सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ होता तो यह कार्य जनवरी 2024 में शुरू हो जाता। पर्यटन विभाग की पूरी योजना तैयार थी और बीबीएमबी से अनुमति भी मिल गई थी। लेकिन नई सरकार की उदासीनता के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना अब अधर में लटक गई है। जिले और प्रदेश के विकास के लिए इस परियोजना का महत्व विशेष है। प्रदेश सरकार को इसे प्राथमिकता देते हुए पहले चरण का काम शुरू करना चाहिए। इन मंदिरों के साथ जिले के लोगों की आस्था के साथ विकास और रोजगार भी जुड़ा है।
त्रिलोक जमवाल, भाजपा विधायक सदर विधानसभा
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-तीन चरणों में प्रस्तावित योजना के पहले चरण पर प्रदेश सरकार को देना था 105 करोड़
-सरकार बदलने के बाद दिल्ली के कार्यालयों में धूल फांक रही फाइल
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। गोबिंद सागर झील में भाखड़ा बांध बनने के बाद जलमग्न हुए ऐतिहासिक मंदिरों को पुनर्स्थापित करने की बहुप्रतीक्षित योजना धनाभाव में अधर में लटकी हुई है। 1500 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पहले चरण के लिए प्रदेश सरकार को 105 करोड़ रुपये की फंडिंग करनी थी। इसके बाद बाकी 1400 करोड़ रुपये की फंडिंग केंद्र सरकार को करनी थी। मगर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद यह योजना पूरी तरह ठप हो गई है। पहले चरण की फंडिंग नहीं होने के कारण परियोजना का काम शुरू नहीं हो सका। अगर राज्य सरकार पहली किस्त जारी कर देती है तो केंद्र सरकार ने बाकी फंडिंग का आश्वासन दिया था। पर्यटन विभाग ने पहले चरण के तहत मंदिरों को शिफ्ट करने के लिए डीपीआर तैयार कर एडीबी को फाइल भेजी थी। बीबीएमबी और पर्यटन विभाग से भी दोनों मॉड्यूल के लिए मंजूरी मिल चुकी थी। इसके तहत नाले के नौण क्षेत्र से गोपाल मंदिर समेत तीन मंदिरों को धौलरा में स्थानांतरित किया जाना था। मिट्टी के सैंपल भी पास हो चुके हैं और मंदिरों को लिफ्ट करने के लिए तकनीकी मॉडल तैयार हो गए हैं। बावजूद इसके, प्रदेश सरकार की पहली किस्त न जारी होने के कारण परियोजना लटक कर रह गई है।
भाजपा सरकार के कार्यकाल में इस परियोजना को लेकर जनता को बड़े आश्वासन दिए गए थे। केंद्र सरकार ने साफ किया था कि अगर प्रदेश सरकार पहले चरण के लिए 105 करोड़ रुपये की राशि जारी करती है तो शेष 1400 करोड़ रुपये इस परियोजना पर केंद्र खर्च करेगा। बताते चलें कि परियोजना के पहले चरण में नाले के नौण क्षेत्र से गोपाल मंदिर समेत तीन मंदिरों को धौलरा में स्थानांतरित करने, दूसरे चरण में सांडू मैदान को पर्यटन दृष्टि से विकसित करने, तीसरे चरण में मंडी भराड़ी के पास बैराज बनाकर मंदिरों के आसपास एक जलाशय का निर्माण करना शामिल है। इसमें रिवर फ्रंट और वॉक वेज का विकास भी प्रस्तावित है। जलमग्न मंदिरों में रंगनाथ, खुनमुखेश्वर, ठाकुरद्वारा, मुरली मनोहर, गोपाल मंदिर और हनुमान मंदिर शामिल हैं। दशकों से जलमग्न इन मंदिरों को पुनर्स्थापित करने की मांग स्थानीय लोगों की ओर से की जा रही है।
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मंदिरों के शिफ्ट होने से न केवल लोगों की धार्मिक आस्था को बल मिलेगा, बल्कि यह क्षेत्र पर्यटन के लिए भी एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। वहीं हिमाचल प्रदेश रोड इन्फास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने डीपीआर बनाकर आगे भेज दी है। लेकिन अभी तक परियोजना की फाइल उससे आगे नहीं बढ़ी है।
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अगर सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ होता तो यह कार्य जनवरी 2024 में शुरू हो जाता। पर्यटन विभाग की पूरी योजना तैयार थी और बीबीएमबी से अनुमति भी मिल गई थी। लेकिन नई सरकार की उदासीनता के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना अब अधर में लटक गई है। जिले और प्रदेश के विकास के लिए इस परियोजना का महत्व विशेष है। प्रदेश सरकार को इसे प्राथमिकता देते हुए पहले चरण का काम शुरू करना चाहिए। इन मंदिरों के साथ जिले के लोगों की आस्था के साथ विकास और रोजगार भी जुड़ा है।
त्रिलोक जमवाल, भाजपा विधायक सदर विधानसभा