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Bilaspur News: शाहतलाई में एक माह तक चलने वाले चैत्र मेले शुरू
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- एडीसी डॉ. निधि पटेल ने झंडा रस्म के साथ किया शुभारंभ
- देश-विदेश से पहुंचेंगे लाखों श्रद्धालु, बाजार में रौनक बढ़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
शाहतलाई(बिलासपुर)। उतर भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल एवं बाबा बालक नाथ की तपोभूमि शाहतलाई में एडीसी डॉ. निधि पटेल ने झंडा रस्म के साथ चैत्र मेले का शुभारंभ किया। इस दौरान बाबा जी के प्राचीन धूणा पर मंत्रोच्चारण किए गए।
बाबा जी की तपोभूमि शाहतलाई में चैत्र मेले 14 अप्रैल तक चलेगे। मेले शुरू होते ही बाजार में चहल-पहल भी बढ़ गई है। ढोलक की थाप पर बाबा बालक नाथ जी के जयकारों की गूंज से समूचे क्षेत्र का माहौल भक्तिमय हो गया है। चैत्र मेलों में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित जापान, अमेरिका, कनाडा से लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा जी के चरणों में शीश झुका कर मन्नत मांगते हैं। मेले का शुभारंभ करने के बाद एडीसी निधि पटेल ने मंदिरों के अलावा अन्य प्रबंधों का निरीक्षण भी किया। उन्होंने कहा कि मेले को लेकर प्रशासन ने पुख्ता प्रबंध किए हैं। एक माह तक चलने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। ताकि बाहरी राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। इस अवसर पर एसडीएम योगराज धीमान, मंदिर प्रभारी एवं मंदिर न्यास के कनिष्ठ अभियंता विजय ठाकुर, नगर पंचायत सचिव खेमचंद वर्मा, नगर पंचायत अध्यक्ष बंदना कुमारी, रोशनी देवी, चमन शर्मा, हरबंस लाल, थाना प्रभारी अमीता चौधरी सहित मंदिर के पुजारी उपस्थित रहे।
इनसेट
बाबा ने शाहतलाई में 12 साल तक चराईं थीं गाय
मान्यताओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ़ से भगवान शिव के दर्शन करने के लिए शाहतलाई आए थे। यहां वह मां रत्नो की गायों को चराते थे। इसके एवज में उन्हें रोटियां और छाछ (लस्सी) मिलती थी। गाय घास चरती रहती थीं, जबकि बाबा बालक नाथ वट वृक्ष के नीचे बैठकर भक्ति में लीन रहते थे। यह सिलसिला लगातार 12 साल तक जारी रहा। एक दिन बाबा तपस्या में मग्न थे। इसी दौरान मवेशियों ने किसानों की फसल चट कर दी। इससे खफा किसानों ने मां रत्नो के पास जाकर उनकी शिकायत की। किसानों की बातों में आकर मां रत्नो ने बाबा बालक नाथ को भला बुरा कहा। यहां तक कि उन्हें रोटियों और छाछ का ताना भी दे दिया। मां रत्नो की बातों को शांत स्वभाव से सुनने के बाद बाबा ने वट वृक्ष के खोल में रखी 12 साल में एकत्रित हुई रोटियों से साथ पास में छाछ से भरा तालाब उन्हें दिखा दिया। तब जाकर मां रत्नो को बाबा बालक नाथ के दिव्य पुरुष होने का अहसास हुआ। उन्होंने बाबा से क्षमा याचना भी की, लेकिन बाबा उस स्थान को त्याग कर धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा में चले गए। दियोटसिद्ध में स्थित यह पवित्र गुफा एक धार्मिक स्थल के रूप में विश्वविख्यात है। अलबत्ता यहां से जाते समय बाबा बालक नाथ ने मां रत्नो से वादा किया था कि वे हर साल चैत्र माह में शाहतलाई आएंगे। बाबा बालक नाथ की ओर से मां रत्नो के साथ किए गए वादे के आधार पर चैत्र माह में शाहतलाई में मेले का आयोजन किया जाता है।
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इनसेट
रोट चढ़ाने से पूरी होती है मनोकामना
मान्यता है कि चैत्र माह के दौरान बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर रोट चढ़ाने वाले भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है। शाहतलाई का समूचा क्षेत्र इन दिनों रात के समय भी रोशनी से नहा रहा है। अलबत्ता समय के साथ मेले का स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। पूर्व में अधिकांश श्रद्धालु पूरा माह या एक सप्ताह यहां शाहतलाई में ढेरा जमाए रखते थे। भजन-कीर्तन करते हुए वह मंदिरों में सुबह शाम की आरती में भाग लेते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा है।
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- देश-विदेश से पहुंचेंगे लाखों श्रद्धालु, बाजार में रौनक बढ़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
शाहतलाई(बिलासपुर)। उतर भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल एवं बाबा बालक नाथ की तपोभूमि शाहतलाई में एडीसी डॉ. निधि पटेल ने झंडा रस्म के साथ चैत्र मेले का शुभारंभ किया। इस दौरान बाबा जी के प्राचीन धूणा पर मंत्रोच्चारण किए गए।
बाबा जी की तपोभूमि शाहतलाई में चैत्र मेले 14 अप्रैल तक चलेगे। मेले शुरू होते ही बाजार में चहल-पहल भी बढ़ गई है। ढोलक की थाप पर बाबा बालक नाथ जी के जयकारों की गूंज से समूचे क्षेत्र का माहौल भक्तिमय हो गया है। चैत्र मेलों में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित जापान, अमेरिका, कनाडा से लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा जी के चरणों में शीश झुका कर मन्नत मांगते हैं। मेले का शुभारंभ करने के बाद एडीसी निधि पटेल ने मंदिरों के अलावा अन्य प्रबंधों का निरीक्षण भी किया। उन्होंने कहा कि मेले को लेकर प्रशासन ने पुख्ता प्रबंध किए हैं। एक माह तक चलने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। ताकि बाहरी राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। इस अवसर पर एसडीएम योगराज धीमान, मंदिर प्रभारी एवं मंदिर न्यास के कनिष्ठ अभियंता विजय ठाकुर, नगर पंचायत सचिव खेमचंद वर्मा, नगर पंचायत अध्यक्ष बंदना कुमारी, रोशनी देवी, चमन शर्मा, हरबंस लाल, थाना प्रभारी अमीता चौधरी सहित मंदिर के पुजारी उपस्थित रहे।
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बाबा ने शाहतलाई में 12 साल तक चराईं थीं गाय
मान्यताओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ़ से भगवान शिव के दर्शन करने के लिए शाहतलाई आए थे। यहां वह मां रत्नो की गायों को चराते थे। इसके एवज में उन्हें रोटियां और छाछ (लस्सी) मिलती थी। गाय घास चरती रहती थीं, जबकि बाबा बालक नाथ वट वृक्ष के नीचे बैठकर भक्ति में लीन रहते थे। यह सिलसिला लगातार 12 साल तक जारी रहा। एक दिन बाबा तपस्या में मग्न थे। इसी दौरान मवेशियों ने किसानों की फसल चट कर दी। इससे खफा किसानों ने मां रत्नो के पास जाकर उनकी शिकायत की। किसानों की बातों में आकर मां रत्नो ने बाबा बालक नाथ को भला बुरा कहा। यहां तक कि उन्हें रोटियों और छाछ का ताना भी दे दिया। मां रत्नो की बातों को शांत स्वभाव से सुनने के बाद बाबा ने वट वृक्ष के खोल में रखी 12 साल में एकत्रित हुई रोटियों से साथ पास में छाछ से भरा तालाब उन्हें दिखा दिया। तब जाकर मां रत्नो को बाबा बालक नाथ के दिव्य पुरुष होने का अहसास हुआ। उन्होंने बाबा से क्षमा याचना भी की, लेकिन बाबा उस स्थान को त्याग कर धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा में चले गए। दियोटसिद्ध में स्थित यह पवित्र गुफा एक धार्मिक स्थल के रूप में विश्वविख्यात है। अलबत्ता यहां से जाते समय बाबा बालक नाथ ने मां रत्नो से वादा किया था कि वे हर साल चैत्र माह में शाहतलाई आएंगे। बाबा बालक नाथ की ओर से मां रत्नो के साथ किए गए वादे के आधार पर चैत्र माह में शाहतलाई में मेले का आयोजन किया जाता है।
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रोट चढ़ाने से पूरी होती है मनोकामना
मान्यता है कि चैत्र माह के दौरान बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर रोट चढ़ाने वाले भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है। शाहतलाई का समूचा क्षेत्र इन दिनों रात के समय भी रोशनी से नहा रहा है। अलबत्ता समय के साथ मेले का स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। पूर्व में अधिकांश श्रद्धालु पूरा माह या एक सप्ताह यहां शाहतलाई में ढेरा जमाए रखते थे। भजन-कीर्तन करते हुए वह मंदिरों में सुबह शाम की आरती में भाग लेते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा है।