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Bilaspur News: अवैध कब्जों के खिलाफ उच्च न्यायालय के आदेश पर गुमान सिंह ने जताई आपत्ति
Fri, 31 Jan 2025 11:24 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Fri, 31 Jan 2025 11:24 PM IST
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-बोले, ये आदेश वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के खिलाफ
-सत्यापन और मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं होने तक वन भूमि से नहीं हो सकती बेदखली
-सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल 2013 को एक मामले में दिए थे स्पष्ट आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
भगेड़(बिलासपुर)। प्रदेश में वन और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ उच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए बेदखली आदेश पर फिर से विवाद उत्पन्न हो गया है। उच्च न्यायालय ने इन कब्जों के मामले में एक बार फिर बेदखली के आदेश दिए, जो हिमाचल प्रदेश सार्वजनिक परिसर और भूमि (बेदखली और किराया वसूली) अधिनियम 1971 और भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 163 के तहत थे। लेकिन, हिमालय नीति अभियान के समन्वयक गुमान सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।
गुमान सिंह ने कहा कि उच्च न्यायालय के ये आदेश वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के खिलाफ हैं, क्योंकि वन अधिकार कानून एक केंद्रीय कानून है जो राज्य के राजस्व कानूनों पर प्रभावी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल 2013 को एक मामले में स्पष्ट आदेश दिया था कि जब तक वन अधिकारों के दावों का सत्यापन और मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक वन भूमि से बेदखली नहीं की जा सकती। बताया कि वन अधिकार कानून की धारा 3 के तहत, हिमाचल प्रदेश के आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों को 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर खेती और निवास का अधिकार दिया गया था। इसके तहत, हिमाचल प्रदेश के आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी किसान परिवार इस कानून के तहत अपने दावे पेश करने के पात्र हैं। प्रदेश की पिछली कांग्रेस और भाजपा सरकार ने वन अधिकार कानून को लागू करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई, और सरकारी अफसरशाही ने भी इसके क्रियान्वयन में बड़ी बाधाएं डाली हैं।
उन्होंने इस मामले पर अपने सुझाव दिए। कहा कि वन भूमि पर कब्जा धारी आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों को ग्राम सभा की वन अधिकार समिति के पास साक्ष्य सहित 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे का दावा पेश करना चाहिए। सरकार को अदालत में यह दलील पेश करनी चाहिए कि जब तक दावों की मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक बेदखली नहीं की जा सकती। प्रदेश सरकार को वन अधिकार कानून लागू करने के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए और आदिवासी व अन्य वन निवासियों को निजी और सामुदायिक वन अधिकार के पट्टे प्रदान किए जाने चाहिए।
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-सत्यापन और मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं होने तक वन भूमि से नहीं हो सकती बेदखली
-सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल 2013 को एक मामले में दिए थे स्पष्ट आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
भगेड़(बिलासपुर)। प्रदेश में वन और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ उच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए बेदखली आदेश पर फिर से विवाद उत्पन्न हो गया है। उच्च न्यायालय ने इन कब्जों के मामले में एक बार फिर बेदखली के आदेश दिए, जो हिमाचल प्रदेश सार्वजनिक परिसर और भूमि (बेदखली और किराया वसूली) अधिनियम 1971 और भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 163 के तहत थे। लेकिन, हिमालय नीति अभियान के समन्वयक गुमान सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है।
गुमान सिंह ने कहा कि उच्च न्यायालय के ये आदेश वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के खिलाफ हैं, क्योंकि वन अधिकार कानून एक केंद्रीय कानून है जो राज्य के राजस्व कानूनों पर प्रभावी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल 2013 को एक मामले में स्पष्ट आदेश दिया था कि जब तक वन अधिकारों के दावों का सत्यापन और मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक वन भूमि से बेदखली नहीं की जा सकती। बताया कि वन अधिकार कानून की धारा 3 के तहत, हिमाचल प्रदेश के आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों को 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर खेती और निवास का अधिकार दिया गया था। इसके तहत, हिमाचल प्रदेश के आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी किसान परिवार इस कानून के तहत अपने दावे पेश करने के पात्र हैं। प्रदेश की पिछली कांग्रेस और भाजपा सरकार ने वन अधिकार कानून को लागू करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई, और सरकारी अफसरशाही ने भी इसके क्रियान्वयन में बड़ी बाधाएं डाली हैं।
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उन्होंने इस मामले पर अपने सुझाव दिए। कहा कि वन भूमि पर कब्जा धारी आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासियों को ग्राम सभा की वन अधिकार समिति के पास साक्ष्य सहित 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे का दावा पेश करना चाहिए। सरकार को अदालत में यह दलील पेश करनी चाहिए कि जब तक दावों की मान्यता प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक बेदखली नहीं की जा सकती। प्रदेश सरकार को वन अधिकार कानून लागू करने के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए और आदिवासी व अन्य वन निवासियों को निजी और सामुदायिक वन अधिकार के पट्टे प्रदान किए जाने चाहिए।
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