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मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की पूजा कर मांगी मन्नतें
yamuna nagar beuro
Updated Tue, 28 Mar 2017 11:52 PM IST
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- फोटो : yamuna nagar
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नवरात्र के पहले दिन श्रद्धालुओं ने घरों में विधिवत घट स्थापना की और मंदिरों में मां भगवती के पहले रूप शैलपुत्री की पूजा कर मन्नतें मांगी। ट्विनसिटी में जगाधरी के प्राचीन देवी भवन मंदिर, छोटी लाइन स्थित जंगलावाली माता मंदिर, रेलवे रोड स्थित गीता भवन मंदिर, रेलवे स्टेशन स्थित प्राचीन देवी मंदिर, मॉडल टाउन स्थित सनातन धर्म मंदिर व रामजी की कुटिया में दिनभर श्रद्धालु उमड़े दिखे। सुबह शुरू हुआ पूजा-अर्चना का सिलसिला दोपहर बाद तक जारी रहा और देर शाम को मंदिरों में आरती हुई।
देवी भवन मंदिर के पुजारी पंडित अतुल शास्त्री ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन सुबह तीन मां भगवती को स्नान के उपरांत वस्त्र धारण कराए गए। इसके उपरांत मां भगवती को श्रृंगार कराया गया। कलश स्थापना के उपरांत मंदिर को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया गया। अलसुबह चार बजे से मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, वैसे-वैसे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती चली गई। सुबह 9 से 10 बजे के बीच मंदिर परिसर में सबसे ज्यादा भीड़ देखी गई। मां भगवती की पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं को काफी समय तक इंतजार करना पड़ा। इसके अलावा यमुनानगर के जंगलावाली माता मंदिर, मॉडल टाउन स्थित सनातन धर्म मंदिर, यमुना गली स्थित मां भगवती मंदिर, जगाधरी की विष्णु गार्डन कॉलोनी स्थित शिव मंदिर के अलावा ट्विनसिटी के अन्य मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ रही।
घरों में कलश स्थापित कर की मां भगवती के पहले रूप की अराधना:
श्रद्धालुओं ने अपने घरों में मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की विधिवत रूप से पूजा अर्चना की। इससे पूर्व श्रद्धालुओं ने विधिवत रूप से कलश की स्थापना की। जगाधरी के राजेश कुमार, प्रवेश कुमारी, मॉडल टाउन निवासी श्रुति शर्मा, स्नेहा और नेहा का कहना है कि उन्होंने नवरात्र के पहले दिन घरों पर विधिवत रूप से मुहूर्त के समय घट स्थापना की। इसके उपरांत मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की आराधना कर मन्नतें मांगी। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मां भगवती की पूजा करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
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ऐसे पड़ा मां दुर्गा के प्रथम रूप का नाम शैलपुत्री:
पंडित महेश शांडिल्य ने बताया कि मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की विधिवत रूप से पूजा अर्चना करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उन्होंने बताया कि सती राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। एक बार जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया, तो अपने दामाद शंकर जी को आमंत्रित नहीं किया। पिता के आमंत्रण के बिना जब सती यज्ञ में शामिल हुई, तो उसे अपमान सहना पड़ा। सती ने यज्ञाग्नि में अपना आत्मोत्सर्ग कर लिया। इसके बाद भगवान शंकर ने तांडव किया। भगवान के इस रूप को काल कालेश्वर कहा गया। सती का ही दूसरा रूप पार्वती या शैलपुत्री है। पर्वतराज की पुत्री होने की वजह से मां दुर्गा के प्रथम रूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। कठोर तप के उपरांत भगवान शंकर से इनका विवाह हुआ।
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देवी भवन मंदिर के पुजारी पंडित अतुल शास्त्री ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन सुबह तीन मां भगवती को स्नान के उपरांत वस्त्र धारण कराए गए। इसके उपरांत मां भगवती को श्रृंगार कराया गया। कलश स्थापना के उपरांत मंदिर को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया गया। अलसुबह चार बजे से मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, वैसे-वैसे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती चली गई। सुबह 9 से 10 बजे के बीच मंदिर परिसर में सबसे ज्यादा भीड़ देखी गई। मां भगवती की पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं को काफी समय तक इंतजार करना पड़ा। इसके अलावा यमुनानगर के जंगलावाली माता मंदिर, मॉडल टाउन स्थित सनातन धर्म मंदिर, यमुना गली स्थित मां भगवती मंदिर, जगाधरी की विष्णु गार्डन कॉलोनी स्थित शिव मंदिर के अलावा ट्विनसिटी के अन्य मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ रही।
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घरों में कलश स्थापित कर की मां भगवती के पहले रूप की अराधना:
श्रद्धालुओं ने अपने घरों में मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की विधिवत रूप से पूजा अर्चना की। इससे पूर्व श्रद्धालुओं ने विधिवत रूप से कलश की स्थापना की। जगाधरी के राजेश कुमार, प्रवेश कुमारी, मॉडल टाउन निवासी श्रुति शर्मा, स्नेहा और नेहा का कहना है कि उन्होंने नवरात्र के पहले दिन घरों पर विधिवत रूप से मुहूर्त के समय घट स्थापना की। इसके उपरांत मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की आराधना कर मन्नतें मांगी। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मां भगवती की पूजा करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
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ऐसे पड़ा मां दुर्गा के प्रथम रूप का नाम शैलपुत्री:
पंडित महेश शांडिल्य ने बताया कि मां भगवती के प्रथम रूप शैलपुत्री की विधिवत रूप से पूजा अर्चना करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उन्होंने बताया कि सती राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। एक बार जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया, तो अपने दामाद शंकर जी को आमंत्रित नहीं किया। पिता के आमंत्रण के बिना जब सती यज्ञ में शामिल हुई, तो उसे अपमान सहना पड़ा। सती ने यज्ञाग्नि में अपना आत्मोत्सर्ग कर लिया। इसके बाद भगवान शंकर ने तांडव किया। भगवान के इस रूप को काल कालेश्वर कहा गया। सती का ही दूसरा रूप पार्वती या शैलपुत्री है। पर्वतराज की पुत्री होने की वजह से मां दुर्गा के प्रथम रूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। कठोर तप के उपरांत भगवान शंकर से इनका विवाह हुआ।