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गणतंत्र दिवस : न घरों में राष्ट्र निर्माण की बातें, न बच्चों में देशभक्ति का जज्बा....
amar ujala beuro yamunanagar
Updated Wed, 25 Jan 2017 11:44 PM IST
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गणतंत्र दिवस यानी छुट्टी का दिन....। देश की भावी पीढ़ी यानि बच्चों से इस बारे में बात की गई तो लगभग सभी इसे होली डे से अधिक कुछ नहीं बता पाए। वे मोबाइल पर गेम्स खेलना या टीवी पर कार्टून सीरियल देखना अधिक पसंद करते हैं। सैकड़ों-हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त हुए देश के बच्चों का यह नजरिया अत्यंत चिंतनीय है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, अमर उजाला ने समाज के विभिन्न वर्गों से इस बारे में उनकी राय जानी।
बच्चों का हो चरित्र निर्माण हो
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय अलाहर के विज्ञान अध्यापक दर्शनलाल बवेजा का कहना है कि आज के विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है। वे गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस को सिर्फ छुट्टी का दिन ही मानते हैं। गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण के लिए स्कूल आना अनिवार्य है, लेकिन आधे से कम बच्चे ही स्कूल आते हैं। आज विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण बहुत जरूरी है ताकि वे अपने देश के महत्वपूर्ण दिनों व तीज-त्योहारों के महत्व को जान सके।
घरों में नहीं होती देश भक्ति की बातें
शहीद परमिंद्र सिंह राजकीय उच्च विद्यालय, तेजली के हिंदी अध्यापक उमेश वत्स का कहना है कि आज घरों में शहीदों के चित्र कोई नहीं लगाता। सही मायनों में घरों में देश प्रेम या देशभक्ति की बातें तक नहीं होती। बच्चें सिर्फ मोबाइल या टीवी से चिपके रहते हैं। ऐसे माहौल में पले-बढ़े बच्चें अपने देश के गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के महत्व को नहीं समझ सकते।
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-शहीदों का सम्मान न होने से बच्चे-युवा हुए विमुख-
शहीदों के जन्म बलिदान दिवस मनाने वाले व इंकलाब मंदिर के संस्थापक एडवोकेट वरियाम सिंह का कहना है जिन अमर शहीदों ने देश के लिए जान दी है। उन्हें आज कोई भी याद नहीं करता। यही कारण है कि शहीदों की इस उपेक्षा को देख सुनकर बड़े हुए युवा अमर शहीदों के बताए मार्ग पर नहीं चलते। आज हर कोई सचिन तेंदुलकर बनना चाहता है पर शहीद भगत सिंह नहीं बनना चाहेगा। यदि शहीदों को पूरा मान-सम्मान दिया जाए तो देश के बच्चों में भी देशभक्ति पनपेगी और वे गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के महत्व को समझ पाएंगे।
-सिलेबस में शामिल हों शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएं-
जिले के स्वतंत्रता सेनानी व नेताजी सुभाषचंद बोस की आजाद हिंद फौज के सदस्य रहे स्वर्गीय सोहन सिंह के बेटे दविंद्र सिंह (64) कहते है कि आज की युवा पीढ़ी को देश की आजादी के इतिहास की कोई जानकारी नहीं है। जबकि देश आजाद होने के बाद दो-तीन दशकों तक घर-घर में देश को आजाद कराने वालों के किस्से सुनाए जाते थे। उनका मानना है कि बच्चों को स्वतंत्रता सेनानियों व अमर शहीदों के बारे में पता होगा तो ही वे उनका आदर-सम्मान कर पाएंगे। इसके लिए एजूकेशन सिस्टम में सुधार करना होगा और शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएं सिलेबस में शामिल करनी चाहिए।
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बच्चों का हो चरित्र निर्माण हो
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय अलाहर के विज्ञान अध्यापक दर्शनलाल बवेजा का कहना है कि आज के विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है। वे गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस को सिर्फ छुट्टी का दिन ही मानते हैं। गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण के लिए स्कूल आना अनिवार्य है, लेकिन आधे से कम बच्चे ही स्कूल आते हैं। आज विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण बहुत जरूरी है ताकि वे अपने देश के महत्वपूर्ण दिनों व तीज-त्योहारों के महत्व को जान सके।
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घरों में नहीं होती देश भक्ति की बातें
शहीद परमिंद्र सिंह राजकीय उच्च विद्यालय, तेजली के हिंदी अध्यापक उमेश वत्स का कहना है कि आज घरों में शहीदों के चित्र कोई नहीं लगाता। सही मायनों में घरों में देश प्रेम या देशभक्ति की बातें तक नहीं होती। बच्चें सिर्फ मोबाइल या टीवी से चिपके रहते हैं। ऐसे माहौल में पले-बढ़े बच्चें अपने देश के गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के महत्व को नहीं समझ सकते।
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-शहीदों का सम्मान न होने से बच्चे-युवा हुए विमुख-
शहीदों के जन्म बलिदान दिवस मनाने वाले व इंकलाब मंदिर के संस्थापक एडवोकेट वरियाम सिंह का कहना है जिन अमर शहीदों ने देश के लिए जान दी है। उन्हें आज कोई भी याद नहीं करता। यही कारण है कि शहीदों की इस उपेक्षा को देख सुनकर बड़े हुए युवा अमर शहीदों के बताए मार्ग पर नहीं चलते। आज हर कोई सचिन तेंदुलकर बनना चाहता है पर शहीद भगत सिंह नहीं बनना चाहेगा। यदि शहीदों को पूरा मान-सम्मान दिया जाए तो देश के बच्चों में भी देशभक्ति पनपेगी और वे गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के महत्व को समझ पाएंगे।
-सिलेबस में शामिल हों शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएं-
जिले के स्वतंत्रता सेनानी व नेताजी सुभाषचंद बोस की आजाद हिंद फौज के सदस्य रहे स्वर्गीय सोहन सिंह के बेटे दविंद्र सिंह (64) कहते है कि आज की युवा पीढ़ी को देश की आजादी के इतिहास की कोई जानकारी नहीं है। जबकि देश आजाद होने के बाद दो-तीन दशकों तक घर-घर में देश को आजाद कराने वालों के किस्से सुनाए जाते थे। उनका मानना है कि बच्चों को स्वतंत्रता सेनानियों व अमर शहीदों के बारे में पता होगा तो ही वे उनका आदर-सम्मान कर पाएंगे। इसके लिए एजूकेशन सिस्टम में सुधार करना होगा और शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएं सिलेबस में शामिल करनी चाहिए।