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श्रद्धालुओं को भक्ति और प्रभु मिलन का मार्ग बताया
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सत्संग के दौरान प्रवचन का श्रवण करते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : Yamuna Nagar
संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी नैतिकता भारती ने प्रवचनों से लोगों को भक्ति व प्रभु मिलन का मार्ग बताया।
उन्होंने कहा कि एक भक्त को अपने मन में उठने वाले हर विचार की तरंग को गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। चूंकि मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने मन और बुद्धि के ताने-बाने में उलझा रहता है। जिस कारण वह प्रभु की दिव्यता को नहीं जान पाता और मानव जीवन के परम लक्ष्य से चूक जाता है। हमारा प्रभु के चरणों में समर्पण इस तरह होना चाहिए जिस तरह मछली जल के लिए समर्पित होती है। वह अपना सर्वस्व पानी को ही मानती है।
यदि मछली को कोई भी सांसारिक प्रलोभन देकर जल छोड़ने के लिए कहा जाए तो ऐसा नहीं करती है। चूंकि वह जानती है कि उसके बिना जीवन संभव नहीं है। वह कदापि उसका त्याग नहीं करेगी। उसके लिए सब कुछ छोड़ना आसान होगा, लेकिन जल का संग छोड़ने पर ही उसकी मृत्यु हो जाती है। इसी तरह एक भक्त भगवान के बिना नहीं रह सकता है। सच्चा भक्त सांसारिक प्रलोभन में फंस कर अपने प्रभु का कदापि त्याग नहीं करता है।
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उन्होंने बताया एक बार एक परिवार विपरीत परिस्थितियों में परेशान होकर आशुतोष महाराज के पास आया और अपनी समस्या बताई। गुरुदेव ने उन्हें ब्रह्मज्ञान का महत्व समझाते हुए कहा कि जब हम अपना सर्वस्व गुरु के चरणों में अर्पित करके मन के प्रत्येक विचार को गुरु के चरणों में अर्पित करके ध्यान साधना करते हैं, तो विपरीत परिस्थितियों में भी प्रभु का वह दिव्य स्वरूप हमें विवेक व धैर्य प्रदान करता है। जो हमें हर परिस्थिति का डटकर सामना करने की ताकत देता है और हमारी आत्मा का संबल बनता है।
जब हम कोई भी समस्या आंतरिक तौर पर गुरु के चरणों में अर्पित होकर उनके आगे रखते हैं तो गुरु कभी सांत्वना नहीं देते, वह हमें समस्या का सीधा और सटीक समाधान देते हैं, जो संसार के रिश्ते नाते और मन बुद्धि से कदापि संभव ही नहीं है। सद्गुरु के चरणों में अर्पण ऐसा होता है जैसे बीज का मिट्टी के लिए होता है। यदि वह खुद को मिट्टी में अर्पित कर देता है, तो वह बीज से वृक्ष बन जाता है और संसार को छाया व मीठे फल देता है। प्रवचनों के अंत में साध्वी बहनों ने समूह संगत को भजनों से कृतार्थ किया।
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी नैतिकता भारती ने प्रवचनों से लोगों को भक्ति व प्रभु मिलन का मार्ग बताया।
उन्होंने कहा कि एक भक्त को अपने मन में उठने वाले हर विचार की तरंग को गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। चूंकि मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने मन और बुद्धि के ताने-बाने में उलझा रहता है। जिस कारण वह प्रभु की दिव्यता को नहीं जान पाता और मानव जीवन के परम लक्ष्य से चूक जाता है। हमारा प्रभु के चरणों में समर्पण इस तरह होना चाहिए जिस तरह मछली जल के लिए समर्पित होती है। वह अपना सर्वस्व पानी को ही मानती है।
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यदि मछली को कोई भी सांसारिक प्रलोभन देकर जल छोड़ने के लिए कहा जाए तो ऐसा नहीं करती है। चूंकि वह जानती है कि उसके बिना जीवन संभव नहीं है। वह कदापि उसका त्याग नहीं करेगी। उसके लिए सब कुछ छोड़ना आसान होगा, लेकिन जल का संग छोड़ने पर ही उसकी मृत्यु हो जाती है। इसी तरह एक भक्त भगवान के बिना नहीं रह सकता है। सच्चा भक्त सांसारिक प्रलोभन में फंस कर अपने प्रभु का कदापि त्याग नहीं करता है।
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उन्होंने बताया एक बार एक परिवार विपरीत परिस्थितियों में परेशान होकर आशुतोष महाराज के पास आया और अपनी समस्या बताई। गुरुदेव ने उन्हें ब्रह्मज्ञान का महत्व समझाते हुए कहा कि जब हम अपना सर्वस्व गुरु के चरणों में अर्पित करके मन के प्रत्येक विचार को गुरु के चरणों में अर्पित करके ध्यान साधना करते हैं, तो विपरीत परिस्थितियों में भी प्रभु का वह दिव्य स्वरूप हमें विवेक व धैर्य प्रदान करता है। जो हमें हर परिस्थिति का डटकर सामना करने की ताकत देता है और हमारी आत्मा का संबल बनता है।
जब हम कोई भी समस्या आंतरिक तौर पर गुरु के चरणों में अर्पित होकर उनके आगे रखते हैं तो गुरु कभी सांत्वना नहीं देते, वह हमें समस्या का सीधा और सटीक समाधान देते हैं, जो संसार के रिश्ते नाते और मन बुद्धि से कदापि संभव ही नहीं है। सद्गुरु के चरणों में अर्पण ऐसा होता है जैसे बीज का मिट्टी के लिए होता है। यदि वह खुद को मिट्टी में अर्पित कर देता है, तो वह बीज से वृक्ष बन जाता है और संसार को छाया व मीठे फल देता है। प्रवचनों के अंत में साध्वी बहनों ने समूह संगत को भजनों से कृतार्थ किया।