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Yamuna Nagar News: श्रद्धालुओं को सुनाया धुंधकारी प्रसंग का वृतांत
Mon, 11 Nov 2024 01:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 11 Nov 2024 01:16 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। ग्रीन पार्क कॉलोनी में श्रीमद्भागवत संगीतमय कथा करवाई जा रही है। जिसका शुभारंभ रविवार को सुबह कलश यात्रा निकालकर की गई। जिसमें काफी संख्या में महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर नगर भ्रमण किया। कथा के पहले दिन आचार्य मदन शास्त्री ने धुंधकारी की कथा का प्रसंग सुनाया।
कलश यात्रा का स्वागत किया गया। कथा स्थल से आरंभ होकर कलश यात्रा विभिन्न मार्गों से होती हुई वापस पंडाल में संपन्न हुई। यात्रा की अगुवाई मुख्य यजमान में रमेश दत्ता ने सपत्नी सिर पर श्रीमद्भागवत पुराण रखकर किया। उनके पीछे रथ पर कथा व्यास एवं संगीत रसिका अनुप्रिया शामिल रहे। जगदीश दत्ता ने पत्नी के साथ कथा व्यास आचार्य मदन शास्त्री व भजन रसिका अनुप्रिया की पूजा की।
आचार्य मदन शास्त्री ने बताया कि तुंगभंगा नदी के किनारे एक गांव में आत्म देव नाम का एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी धुंधली रहती थी। आत्म देव तो सज्जन तो उसकी पत्नी दुष्ट प्रवृति की थी। आत्म देव बहुत उदास रहता था, चूंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन हताश होकर जंगल की तरफ निकला तो रास्ते में एक ऋषि मिले। आत्म देव ऋषि को अपनी व्यथा सुनाई।
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ऋषि ने उसे एक फल दिया और उसको अपनी पत्नी को खिलाने को कहा और बताया कि एक वर्ष तुम्हारी पत्नी को सात्विक जीवन जीना पड़ेगा। आत्म देव वह फल लेकरघर लौटा, तो पत्नी ने फल गाय को खिला दिया। वहीं, अपनी बहन का पुत्र अपना बताकर घर ले आई। धुंधली ने पुत्र का नाम धुंधकारी रखा। वहीं, फल के प्राप्त से गाय ने एक मानव शिशु को जन्म दिया।
शिशु के कान गाय की तरह बड़े थे। जिसका आत्मदेव ने उसका नाम गोकर्ण रखा। दोनों बड़े होने लगे। धुंधकारी की प्रवृत्ति से परेशान होकर मां धुंधली ने कुएं में कूद कर जान दे दी। वहीं, वह वैश्यों के चक्कर में पड़कर चोरी करने लगा। धुंधकारी की प्रवृत्ति से परेशान होकर वैश्याओं ने उसे आग में जिंदा जला दिया। इसके बाद धुंधकारी प्रेत बनकर गोकर्ण को डराने लगा।
परंतु तपस्वी गोकर्ण को कभी नुकसान नहीं पहुंचा पाया। उसने विद्वानों से धुंधकारी की मुक्ति के बारे पूछा और श्रीमद्भागवत कथा करवाई। जिसके बाद धुंधकारी को मुक्ति मिली। कथा व्यास ने बताया कि इस युग में श्रीमद्भागवत कथा सुनने मात्र से मुक्ति मिलती है। कथा के दौरान अनुप्रिया ने भजनों से प्रभु की महिमा का गुणगान किया।
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जगाधरी। ग्रीन पार्क कॉलोनी में श्रीमद्भागवत संगीतमय कथा करवाई जा रही है। जिसका शुभारंभ रविवार को सुबह कलश यात्रा निकालकर की गई। जिसमें काफी संख्या में महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर नगर भ्रमण किया। कथा के पहले दिन आचार्य मदन शास्त्री ने धुंधकारी की कथा का प्रसंग सुनाया।
कलश यात्रा का स्वागत किया गया। कथा स्थल से आरंभ होकर कलश यात्रा विभिन्न मार्गों से होती हुई वापस पंडाल में संपन्न हुई। यात्रा की अगुवाई मुख्य यजमान में रमेश दत्ता ने सपत्नी सिर पर श्रीमद्भागवत पुराण रखकर किया। उनके पीछे रथ पर कथा व्यास एवं संगीत रसिका अनुप्रिया शामिल रहे। जगदीश दत्ता ने पत्नी के साथ कथा व्यास आचार्य मदन शास्त्री व भजन रसिका अनुप्रिया की पूजा की।
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आचार्य मदन शास्त्री ने बताया कि तुंगभंगा नदी के किनारे एक गांव में आत्म देव नाम का एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी धुंधली रहती थी। आत्म देव तो सज्जन तो उसकी पत्नी दुष्ट प्रवृति की थी। आत्म देव बहुत उदास रहता था, चूंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन हताश होकर जंगल की तरफ निकला तो रास्ते में एक ऋषि मिले। आत्म देव ऋषि को अपनी व्यथा सुनाई।
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ऋषि ने उसे एक फल दिया और उसको अपनी पत्नी को खिलाने को कहा और बताया कि एक वर्ष तुम्हारी पत्नी को सात्विक जीवन जीना पड़ेगा। आत्म देव वह फल लेकरघर लौटा, तो पत्नी ने फल गाय को खिला दिया। वहीं, अपनी बहन का पुत्र अपना बताकर घर ले आई। धुंधली ने पुत्र का नाम धुंधकारी रखा। वहीं, फल के प्राप्त से गाय ने एक मानव शिशु को जन्म दिया।
शिशु के कान गाय की तरह बड़े थे। जिसका आत्मदेव ने उसका नाम गोकर्ण रखा। दोनों बड़े होने लगे। धुंधकारी की प्रवृत्ति से परेशान होकर मां धुंधली ने कुएं में कूद कर जान दे दी। वहीं, वह वैश्यों के चक्कर में पड़कर चोरी करने लगा। धुंधकारी की प्रवृत्ति से परेशान होकर वैश्याओं ने उसे आग में जिंदा जला दिया। इसके बाद धुंधकारी प्रेत बनकर गोकर्ण को डराने लगा।
परंतु तपस्वी गोकर्ण को कभी नुकसान नहीं पहुंचा पाया। उसने विद्वानों से धुंधकारी की मुक्ति के बारे पूछा और श्रीमद्भागवत कथा करवाई। जिसके बाद धुंधकारी को मुक्ति मिली। कथा व्यास ने बताया कि इस युग में श्रीमद्भागवत कथा सुनने मात्र से मुक्ति मिलती है। कथा के दौरान अनुप्रिया ने भजनों से प्रभु की महिमा का गुणगान किया।