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अज्ञानता के अंधकार से ब्रह्मज्ञान के प्रकार की ओर ले जाता है गुरु : वंशिका

Mon, 13 Apr 2026 01:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर Updated Mon, 13 Apr 2026 01:27 AM IST
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The Guru leads from the darkness of ignorance to the realm of Brahma Gyan: Vanshika
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। इसमें साध्वी वंशिका भारती ने प्रवचन किया। साध्वी वंशिका ने श्रद्धालुओं को गुरु भक्ति का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मज्ञान से हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान प्रकाश की ओर अग्रसर करने वाली दिव्य सत्ता को गुरु कहा जाता है।
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उन्होंने कहा कि हम परमात्मा के निराकार स्वरूप की भक्ति करते हैं, तब तक परमात्मा हमारे कर्म संस्कारों की व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करता है। मनुष्य को प्रकृति के निर्धारित समय अनुसार अपने कर्मों का फल प्राप्त होता रहता है। निराकार परमात्मा की भक्ति हमें अध्यात्म की और अग्रसर अवश्य कर सकती है। किंतु मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति केवल साकार स्वरूप परमात्मा की शरणागत होने से ही होती है। साकार स्वरूप ब्रह्म गुरु के रूप में इस धरा पर अवतरित होकर संपूर्ण मानव को गुरु भक्ति का संदेश देते हैं, ताकि वे कर्म बंधनों में उलझी जीव आत्माओं को मुक्ति का मार्ग दिखा सकें। यदि एक वाक्य में ये कहा जाए कि भक्ति का श्रेष्ठतम स्वरूप गुरु भक्ति ही है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। चूंकि साकार गुरु अपने तपोबल से हमारे कर्मों के प्रावधान में भी हस्तक्षेप करता है।
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अपने शिष्य के लिए स्वयं प्रकृति के नियमों को बदल देने में सक्षम हैं। गुरु अपने शिष्य के भूत, भविष्य और वर्तमान को देखते हुए उसके लिए लक्ष्य निर्धारण करता है। यदि शिष्य निरंतर अपने पुरुषार्थ और दृढ़ निश्चय से गुरु आज्ञा में निरंतर चलता रहता है, तो कदाचित वह अपने उस लक्ष्य की प्राप्ति कर पाता है जो स्वयं गुरु उसके लिए निर्धारित करते हैं। शिष्य का कल्याण का तरीका गुरु जानते हैं। इसी लिए वे शिष्य को सत्संग, सेवा, साधना व सुमिरन में लगाकर उसके कर्मों का शोधन करते हैं। अपने शिष्य का निर्माण करने के लिए गुरु की शैली अति दिव्य और विलक्षण होती है। उसके संचित कर्मों को समूल विनष्ट करके प्रारब्ध की धार को कुंठित कर देते हैं, ताकि वह प्रारब्ध रूपी कर्मों का फल उनके शिष्य को आहत न कर पाए। केवल परमात्मा की कृपा और पुण्य पुंज ही हमारे भीतर गुरु भक्ति को प्रकट कर सकते हैं। चूंकि गुरु सत्ता के प्रति समर्पण सरल नहीं है, अंत में साध्वी ने बुलंद वाणी में उद्घोष करते हुए कहा कि मानव समाज को ऐसे दिव्य पुरोधा मार्गदर्शक की आवश्यकता है।

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करती साध्वी वंशिका भारती व अ

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