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किसानों को गाजर घास के नुकसान बताए

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 25 Aug 2021 12:53 AM IST
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Tell the farmers about the disadvantages of carrot grass, Yamunanagar
किसानों को गाजर घास के प्रति जागरूक करते कृषि वैज्ञानिक। संवाद - फोटो : Yamuna Nagar
संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और खरपतवार अनुसंधान निदेशालय जबलपुर के सहयोग जागरूकता सप्ताह करवाया जा रहा है। इसी कड़ी में दामला कृषि विज्ञान केंद्र ने गांव बकाना में गाजर घास के बारे में किसानों के लिए जागरूकता अभियान चलाया। इस दौरान किसानोें को गाजर घास के नुकसान बताए गए।
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. एनके गोयल ने बताया कि गाजर घास नाम का यह खरपतवार 1955 में पहली बार भारत में आया था और तब से यह पूरे देश में फैल गया है। उन्होंने बताया कि इस खरपतवार को देश के विभिन्न भागों में गाजर घास, पार्थेनियम, चटक चंदनी, सफेद टोपी आदि नामों से भी जाना जाता है। यह खरपतवार मुख्य रूप से खाली भूमि, औद्योगिक क्षेत्रों, गैर खेती वाली भूमि, सड़क किनारे और रेलवे लाइन की पटरियों पर पाया जाता है। उन्होंने कहा कि खरपतवार अनियंत्रित रहता है तो फसलों और सब्जियों वाले खेतों में भी पाया जा सकता है।
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उन्होंने कहा कि इसके सीधे संपर्क में आने से बचने बचना चाहिए। इससे मनुष्यों में त्वचा संबंधी रोग, एग्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा आदि बीमारियां हो सकती है। इसी तरह पशुओं के लिए भी यह खरपतवार अत्यधिक विषाक्त होता है। जैव विविधता के लिए भी गाजर घास एक बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। प्रशिक्षण सहायक कर्ण सैनी ने कहा कि गाजर घास का पौधा तीन से चार महीनों में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेता है और एक वर्ष में इसकी तीन से चार पीढ़ियां पूरी हो जाती हैं।
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वर्षा ऋतु में गाजर घास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर कंपोस्ट एवं वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए। घर के आसपास और खेत के चारों तरफ गेंदा का पौधा लगाकर गाजर घास के फैलाव एवं वृद्धि को रोका जा सकता है। उन्होंने बताया कि गांव बकाना, सबापुर, धौडंग, मुस्तफाबाद आदि में शिविर लगाए जा चुके हैं। पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. फतेह सिंह व मौसम विषय विशेषज्ञ डॉ. अजीत सिंह ने भी किसानों को जागरूक किया।
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