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सर्व-धर्म समभाव के प्रतीक थे शहीद ऊधम सिंह

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 27 Dec 2021 12:48 AM IST
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Shaheed Udham Singh was a symbol of equality of all religions, Yamunanagar
इंकलाब मंदिर में शहीद ऊधम सिंह की प्रतिमा के समक्ष जयघोष करते लोग। संवाद - फोटो : Yamuna Nagar
संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। जिले में शहीद ऊधम सिंह के जन्मदिवस पर विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम हुए। इस दौरान लोगों ने शहीद की प्रतिमा व चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। जिले की विभिन्न सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं सहित राजनीतिक संगठनों की ओर से शहीद को नमन किया।
इंकलाब मंदिर में शहीद ऊधम सिंह कांबोज जन्मदिवस उत्सव के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में आसपास क्षेत्र के बच्चों, किशोरों, युवाओं सहित तमाम लोगों ने हिस्सा लिया। मंदिर संस्थापक अधिवक्ता वरयाम सिंह ने लोगों को शहीद ऊधम सिंह के जीवन के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि हमारा देश शौर्य व त्याग की गाथाओं से भरा है, जिसकी लोगों को जानकारी नहीं है। क्षेत्रवाद के कारण देश की धरोहर वर्ग विशेष में सिमट कर रह गए हैं। हमारी पीढ़ियों को शहीदों का इतिहास विरासत में दिया जाना चाहिए। सभी को देश पर मर मिटने वालों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए।
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मुख्यातिथि इस्जेक के वाइस प्रेसिडेंट कर्नल कुलबीर सिंह राणा ने कहा कि क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव के एक परिवार में हुआ था। शहीद ऊधम सिंह देश में सर्व-धर्म समभाव के प्रतीक थे। उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था। उनका यह नाम भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक था। क्रांतिकारी ऊधम सिंह 13 अप्रैल 1919 को पंजाब में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे।
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नरसंहार से क्रांतिकारी ऊधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ली थी कि जनरल डायर को उसके किए अपराधों की सजा देंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। 1934 में ऊधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां एल्डर स्ट्रीट कामर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने एक कार खरीदी और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। इसके बाद वे माइकल ओ डायर को सबक सिखाने के लिए सही समय का इंतजार करने लगे।
जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के कैक्सटन हाल में बैठक थी। बैठक में माइकल ओ डायर को वक्ता के रूप में बुलाया गया था। ऊधम सिंह भी बैठक में पहुंच गए। उन्होंने अपनी रिवॉल्वर एक मोटी किताब में छिपा ली थी। बैठक के बाद दीवार के पीछे से उन्होंने माइकल ओ डायर पर गोलियां चलाईं। दो गोलियां लगने से माइकल ओ डायर की तत्काल मौत हो गई।
गोली मारने के बाद उन्होंने भागने की कोशिश भी नहीं की बल्कि अपनी गिरफ्तारी दे दी। गिरफ्तारी के बाद उन पर मुकदमा चला। मुकदमे के बाद 4 जून 1940 को ऊधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस दौरान बलदेव सिंह, शेर सिंह मलिक, एडवोकेट सर्वजीत सिंह, शिवकुमार, अभिषेक, सूरज मलिक, सर्वजीत राणा, रतन सिंह, संजीव कुमार, संजीव कांबोज, कुलवंत संधू, गुरुमुख सिंह, सोनू राम, अवतार सिंह आदि मौजूद रहे।
शहीद को पुष्प अर्पित कर दी श्रद्धांजलि
रादौर। संजय गांधी स्कूल हरनौल में शहीद भगत सिंह मोर्चा ने रविवार को शहीद ऊधम सिंह का जन्मदिवस मनाया। मोर्चा अध्यक्ष रणधीर चौधरी व स्कूल के स्टॉफ सदस्यों ने शहीद ऊधमसिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। रणधीर चौधरी ने कहा कि देश के लिए लाखों लोगों ने शहादत दी थी। तब जाकर हमें वर्षों की गुलामी के बाद आजादी मिली। शहीद ऊधम सिंह, शहीद भगत सिंह को अपना आदर्श मानते थे। हम शहीदों का कर्ज सारी जिंदगी भर नहीं उतार सकते हैं। हमे अपनी संतानों को शहीदों की शहादत के बारे में बताना चाहिए। संवाद

नहीं भुलाई जा सकती ऊधम सिंह की शहादत
जठलाना। शहीद ऊधम सिंह के जन्मदिवस पर कार्यक्रम करवाया गया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मांगेराम मारूपुर व अन्य लोगों ने शहीद ऊधम सिंह की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। मांगेराम ने कहा कि पूरा देश ऊधम सिंह की शहादत को हमेशा याद रखेगा। उनकी शहादत कभी भुलाई नहीं जा सकती है। उन्होंने कहा कि आज भारत मां के उस वीर सपूत की जयंती है, जिसने दुश्मन को उसी के घर में घुसकर मारा और जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लिया था। संवाद
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