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Yamuna Nagar News: अब यूरिया नहीं, सोया आधारित रेजिन से तैयार होगी प्लाई
Fri, 07 Aug 2026 12:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Fri, 07 Aug 2026 12:08 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। देश के प्रमुख प्लाईवुड हब यमुनानगर में प्लाईवुड उद्योग अब बड़े तकनीकी बदलाव की ओर बढ़ रहा है। प्लाई तैयार करने में अब तकनीकी ग्रेड यूरिया से बनने वाले पारंपरिक ग्लू की जगह यूरिया मुक्त रेजिन (ग्लू) का इस्तेमाल शुरू हो गया है। जिले की करीब 40 प्रतिशत प्लाईवुड इकाइयों में इसका सफल ट्रायल पूरा हो चुका है।
वहीं कई फैक्टरियों ने इसका व्यावसायिक उपयोग भी शुरू कर दिया है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि ग्लू बनाने की लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी आएगी। नई तकनीक के तहत तैयार होने वाला यूरिया मुक्त रेजिन सोया प्रोटीन, मैदा, मेलामाइन, लिगनेन, स्टार्च तथा विभिन्न रिएक्शन केमिकल्स से तैयार किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसकी निर्माण प्रक्रिया में थोड़ी अतिरिक्त तकनीकी सावधानी की जरूरत होती है, लेकिन एक बार तकनीक विकसित होने के बाद इसका उपयोग आसान हो जाता है। बाजार में अब ऐसे आयातित रेडीमेड पाउडर भी उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से साधारण प्रक्रिया के जरिए रेजिन तैयार किया जा सकता है।
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जिले में करीब 350 प्लाईवुड इकाइयां संचालित हैं। यहां उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड से पॉपुलर व सफेदा की लकड़ी लाकर सालाना करीब 7000 क्यूबिक मीटर प्लाई का उत्पादन किया जाता है। अब तक अधिकांश इकाइयों में ग्लू बनाने के लिए तकनीकी ग्रेड यूरिया का उपयोग होता था।
हालांकि समय-समय पर कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले सब्सिडी वाले यूरिया के दुरुपयोग के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे मामलों में कई बार छापेमारी और कानूनी कार्रवाई के चलते उद्योग को परेशानी का सामना करना पड़ा। यूरिया मुक्त ग्लू के इस्तेमाल से ऐसी आशंकाएं भी काफी हद तक समाप्त होने की उम्मीद है।
जिले में घटी यूरिया की खपत
वित्त वर्ष 2025-26 में जिले में यूरिया की खपत में पहली बार उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2024-25 में 1,52,725.068 मीट्रिक टन यूरिया की खपत हुई थी, जबकि 2025-26 में यह घटकर 1,25,114.692 मीट्रिक टन रह गई। यानी 27,610.376 मीट्रिक टन (22.06 प्रतिशत) की कमी आई, जो लगभग 6.13 लाख यूरिया बैग के बराबर है। इससे सरकार को एक वर्ष में करीब 123 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचाने में मदद मिली। इस अवधि में 14 एफआईआर दर्ज की गईं, 6,845 यूरिया बैग जब्त किए गए तथा 30 उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द किए गए।
टेक्निकल ग्रेड यूरिया से होती है समस्या
जगाधरी स्थित एवीएन प्लाईवुड फैक्टरी के संचालक अनुज व एसएस वुड फैक्टरी के संचालक सतीश सैनी ने बताया कि टेक्निकल ग्रेड यूरिया से ग्लू बनाने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने यूरिया मुक्त ग्लू का इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे लागत में तो कमी आई है साथ ही मजबूती पर भी कोई विपरीत असर नहीं पड़ा है। आने वाले दिनों में इसमें और सुधार होंगे।
प्लाईवुड उद्योग में यूरिया मुक्त रेजिन का प्रयोग सफल साबित हुआ है। कई इकाइयों ने अपनाना शुरू कर दिया है। इससे उत्पादन लागत कम होगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। - जेके बिहानी, अध्यक्ष, हरियाणा प्लाईवुड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन।
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यमुनानगर। देश के प्रमुख प्लाईवुड हब यमुनानगर में प्लाईवुड उद्योग अब बड़े तकनीकी बदलाव की ओर बढ़ रहा है। प्लाई तैयार करने में अब तकनीकी ग्रेड यूरिया से बनने वाले पारंपरिक ग्लू की जगह यूरिया मुक्त रेजिन (ग्लू) का इस्तेमाल शुरू हो गया है। जिले की करीब 40 प्रतिशत प्लाईवुड इकाइयों में इसका सफल ट्रायल पूरा हो चुका है।
वहीं कई फैक्टरियों ने इसका व्यावसायिक उपयोग भी शुरू कर दिया है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि ग्लू बनाने की लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी आएगी। नई तकनीक के तहत तैयार होने वाला यूरिया मुक्त रेजिन सोया प्रोटीन, मैदा, मेलामाइन, लिगनेन, स्टार्च तथा विभिन्न रिएक्शन केमिकल्स से तैयार किया जाता है।
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विशेषज्ञों के अनुसार इसकी निर्माण प्रक्रिया में थोड़ी अतिरिक्त तकनीकी सावधानी की जरूरत होती है, लेकिन एक बार तकनीक विकसित होने के बाद इसका उपयोग आसान हो जाता है। बाजार में अब ऐसे आयातित रेडीमेड पाउडर भी उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से साधारण प्रक्रिया के जरिए रेजिन तैयार किया जा सकता है।
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जिले में करीब 350 प्लाईवुड इकाइयां संचालित हैं। यहां उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड से पॉपुलर व सफेदा की लकड़ी लाकर सालाना करीब 7000 क्यूबिक मीटर प्लाई का उत्पादन किया जाता है। अब तक अधिकांश इकाइयों में ग्लू बनाने के लिए तकनीकी ग्रेड यूरिया का उपयोग होता था।
हालांकि समय-समय पर कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले सब्सिडी वाले यूरिया के दुरुपयोग के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे मामलों में कई बार छापेमारी और कानूनी कार्रवाई के चलते उद्योग को परेशानी का सामना करना पड़ा। यूरिया मुक्त ग्लू के इस्तेमाल से ऐसी आशंकाएं भी काफी हद तक समाप्त होने की उम्मीद है।
जिले में घटी यूरिया की खपत
वित्त वर्ष 2025-26 में जिले में यूरिया की खपत में पहली बार उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2024-25 में 1,52,725.068 मीट्रिक टन यूरिया की खपत हुई थी, जबकि 2025-26 में यह घटकर 1,25,114.692 मीट्रिक टन रह गई। यानी 27,610.376 मीट्रिक टन (22.06 प्रतिशत) की कमी आई, जो लगभग 6.13 लाख यूरिया बैग के बराबर है। इससे सरकार को एक वर्ष में करीब 123 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचाने में मदद मिली। इस अवधि में 14 एफआईआर दर्ज की गईं, 6,845 यूरिया बैग जब्त किए गए तथा 30 उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस रद्द किए गए।
टेक्निकल ग्रेड यूरिया से होती है समस्या
जगाधरी स्थित एवीएन प्लाईवुड फैक्टरी के संचालक अनुज व एसएस वुड फैक्टरी के संचालक सतीश सैनी ने बताया कि टेक्निकल ग्रेड यूरिया से ग्लू बनाने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने यूरिया मुक्त ग्लू का इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे लागत में तो कमी आई है साथ ही मजबूती पर भी कोई विपरीत असर नहीं पड़ा है। आने वाले दिनों में इसमें और सुधार होंगे।
प्लाईवुड उद्योग में यूरिया मुक्त रेजिन का प्रयोग सफल साबित हुआ है। कई इकाइयों ने अपनाना शुरू कर दिया है। इससे उत्पादन लागत कम होगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। - जेके बिहानी, अध्यक्ष, हरियाणा प्लाईवुड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन।