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आदिबद्री में महाभारत युद्ध का शुभारंभ के समय बजाए जाने वाला पंचजन्य शंख विराजमान
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बिलासपुर। पांच हजार वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध में बजाए जाने वाला भगवान श्रीकृष्ण का शंख पांचजन्य आदिबद्री में आज भी विराजमान है। यह शंख कपालमोचन में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बजाकर महाभारत के युद्ध का शंखनाद किया था। शंख बजाने से मानव समाज को संक्रामक रोगों से मुक्ति मिलती है। वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है, जिस स्थल पर शंख विराजमान है, उसके पास कई किलोमीटर तक पर्यावरण और प्रकृति शुद्ध रहती है। कार्तिक मास के दौरान श्रीआदि बद्री नारायण और शंख की कमल के फूलों के साथ पूजा अर्चना की जाती है। पूजा के लिए कमल के फूल विशेष रूप से कोलकाता से मंगाए जाते हैं। कार्तिक मास में श्री आदि केदारनाथ की पूजा करने से जाने अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। मंदिर के महंत अनुसार पांचजन्य शंख 5119 वर्ष पुराना है।
कपालमोचन मेले से आदि बद्री में दर्शन करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु पांचजन्य शंख के दर्शन मात्र से खुद को धन्य महसूस करता है। महाभारत के युद्ध के समापन के बाद जब पांडव उतर दिशा की ओर निकले तो सिंधुवन में भगवान नारायण की तपोस्थली पर पांचजन्य को रखा गया। आदि ब्रदी मंदिर के महंत पं. अरविंद चौबे ने बताया कि मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय भी यहीं बिताया था। महाभारत के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बजाया गया पांचजन्य शंख आज भी यहां आदि ब्रदी मंदिर में मौजूद है। पांचजन्य को विशेष धार्मिक उत्सवों और पर्वों पर ही बजाया जाता है। हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भी शंख को आरती के समय सुबह शाम बजाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु पाताल लोक से धरा लोक पर अवरित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर उतराखंड में बने बद्रीनाथ और केदारनाथ के मंदिर से भी प्राचीन है। महंत ने बताया कि पांडवों ने अपना अज्ञात काल भी आखिरी वर्ष यहीं बिताया था।
कहा जाता है कि एक बार नारायण लक्ष्मी से रुष्ट होकर सिंधुवन में आकर तपस्या में लीन हो गए थे। आकाश लेाक में खोज करने पर जब नारायण को कुछ पता नहीं चलता तो माता लक्ष्मी नारद जी का स्मरण करती हैं और नारद लक्ष्मी जी को कहते हैं कि जब मैं मृत्यु लोक से विचरण करते हुए निकल रहा था तो मैंने शिवालिक की तलहटी में बहने वाली सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर समप्रास नामक गुफा में देखा कि आदि बद्री नारायण तपस्या में लीन हैं। उनकी पूजा व्यास जी कर रहे हैं। माता लक्ष्मी ने नारायण को तपस्या करते हुए देखा तो नारायण का रंग काला पड़ गया। तो लक्ष्मी माता ने बदली बनकर छाया की तभी से इसका नाम आदि बद्री नारायण पड़ गया। कार्तिक में श्रीआदिब्रदी नारायण मंदिर में पूजन का महत्व बढ़ जाता है।
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ब्रह्मचारी विनय स्वरूप ने बताया कि कार्तिक मास में पर्यावरण और प्रकृति सुखद संदेश लेकर आती है। इस मास में आदि ब्रदी नारायण की तपो मुद्रा का विशेष प्रभाव है। पांचजन्य शंख वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है।
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कपालमोचन मेले से आदि बद्री में दर्शन करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु पांचजन्य शंख के दर्शन मात्र से खुद को धन्य महसूस करता है। महाभारत के युद्ध के समापन के बाद जब पांडव उतर दिशा की ओर निकले तो सिंधुवन में भगवान नारायण की तपोस्थली पर पांचजन्य को रखा गया। आदि ब्रदी मंदिर के महंत पं. अरविंद चौबे ने बताया कि मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय भी यहीं बिताया था। महाभारत के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बजाया गया पांचजन्य शंख आज भी यहां आदि ब्रदी मंदिर में मौजूद है। पांचजन्य को विशेष धार्मिक उत्सवों और पर्वों पर ही बजाया जाता है। हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भी शंख को आरती के समय सुबह शाम बजाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु पाताल लोक से धरा लोक पर अवरित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर उतराखंड में बने बद्रीनाथ और केदारनाथ के मंदिर से भी प्राचीन है। महंत ने बताया कि पांडवों ने अपना अज्ञात काल भी आखिरी वर्ष यहीं बिताया था।
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कहा जाता है कि एक बार नारायण लक्ष्मी से रुष्ट होकर सिंधुवन में आकर तपस्या में लीन हो गए थे। आकाश लेाक में खोज करने पर जब नारायण को कुछ पता नहीं चलता तो माता लक्ष्मी नारद जी का स्मरण करती हैं और नारद लक्ष्मी जी को कहते हैं कि जब मैं मृत्यु लोक से विचरण करते हुए निकल रहा था तो मैंने शिवालिक की तलहटी में बहने वाली सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर समप्रास नामक गुफा में देखा कि आदि बद्री नारायण तपस्या में लीन हैं। उनकी पूजा व्यास जी कर रहे हैं। माता लक्ष्मी ने नारायण को तपस्या करते हुए देखा तो नारायण का रंग काला पड़ गया। तो लक्ष्मी माता ने बदली बनकर छाया की तभी से इसका नाम आदि बद्री नारायण पड़ गया। कार्तिक में श्रीआदिब्रदी नारायण मंदिर में पूजन का महत्व बढ़ जाता है।
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ब्रह्मचारी विनय स्वरूप ने बताया कि कार्तिक मास में पर्यावरण और प्रकृति सुखद संदेश लेकर आती है। इस मास में आदि ब्रदी नारायण की तपो मुद्रा का विशेष प्रभाव है। पांचजन्य शंख वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है।