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Yamuna Nagar News: महाराजा रणजीत सिंह को पुष्प अर्पित कर किया नमन
Tue, 05 Nov 2024 02:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 05 Nov 2024 02:57 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर/रादौर। जाट छात्रसंघ की ओर से सोमवार को महाराजा रणजीत सिंह की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर प्रधान साहिल बालियान के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने महाराजा रणजीत सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।
इस दौरान बालियान ने कहा कि महाराजा रणजीत सिंह का जन्म चार नवंबर 1780 को उनका जन्म गुजरांवाला में हुआ था। वह जब 12 वर्ष के थे तो उनके पिता सरदार महा सिंह का निधन हो गया था। रणजीत सिंह ने होश संभालते ही 1799 में लाहौर व 1805 में अमृतसर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया किया था। उसके बाद उन्होंने कसूर, जम्मू, मुल्तान, कांगड़ा, शिमला और कश्मीर को एक एक करके अपने राज्य में मिलाया।
उन्होंने कहा कि रणजीत सिंह धर्मप्रेमी शासक थे। अफगानिस्तान विजय से जो सोना उन्हे मिला, उसका आधा सोना स्वर्ण मंदिर अमृतसर और आधा कांशी विश्वनाथ मंदिर को दान में दिया गया। उन्होंने कोहिनूर हीरा प्राप्त कर उसे पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भेंट किया, परंतु दुर्भाग्यवश वहां पहुंचने से पहले ही उसे अंग्रेजों ने हड़प लिया। 27 जून 1839 को उनका निधन हो गया। हमें ऐसे महान योद्धा पर हमेशा गर्व रहेगा।
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यमुनानगर/रादौर। जाट छात्रसंघ की ओर से सोमवार को महाराजा रणजीत सिंह की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर प्रधान साहिल बालियान के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने महाराजा रणजीत सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।
इस दौरान बालियान ने कहा कि महाराजा रणजीत सिंह का जन्म चार नवंबर 1780 को उनका जन्म गुजरांवाला में हुआ था। वह जब 12 वर्ष के थे तो उनके पिता सरदार महा सिंह का निधन हो गया था। रणजीत सिंह ने होश संभालते ही 1799 में लाहौर व 1805 में अमृतसर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया किया था। उसके बाद उन्होंने कसूर, जम्मू, मुल्तान, कांगड़ा, शिमला और कश्मीर को एक एक करके अपने राज्य में मिलाया।
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उन्होंने कहा कि रणजीत सिंह धर्मप्रेमी शासक थे। अफगानिस्तान विजय से जो सोना उन्हे मिला, उसका आधा सोना स्वर्ण मंदिर अमृतसर और आधा कांशी विश्वनाथ मंदिर को दान में दिया गया। उन्होंने कोहिनूर हीरा प्राप्त कर उसे पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भेंट किया, परंतु दुर्भाग्यवश वहां पहुंचने से पहले ही उसे अंग्रेजों ने हड़प लिया। 27 जून 1839 को उनका निधन हो गया। हमें ऐसे महान योद्धा पर हमेशा गर्व रहेगा।
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