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Yamuna Nagar News: खार के वन से पड़ा नाम खारवन, गांव में भाईचारे की मिसाल
Mon, 15 Jun 2026 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 15 Jun 2026 12:57 AM IST
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गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद
अभय सिंह
जगाधरी। जिले के सबसे बड़े गांव में शामिल खारवन स्वयं में कई कहानियां समेटे हुए हैं। इस गांव का इतिहास राजसी काल का बताया जाता है। गांव के पुराने लोगों का कहना है उन्हें कलसिया रियासत तक ज्ञात है, लेकिन इससे पहले के इतिहास में किसी को सही जानकारी नहीं है। खारवन जिले के छछरौली क्षेत्र का प्राचीन और बड़ा गांव माना जाता है।
यह शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी के निकट स्थित है और ऐतिहासिक रूप से पूर्ववर्ती कलसिया रियासत के प्रभाव क्षेत्र में आता था। छछरौली स्वयं कलसिया रियासत की राजधानी रही है, इसलिए आसपास के गांवों का विकास भी इसी रियासत के प्रशासन और कृषि व्यवस्था के अंतर्गत हुआ।
इस गांव का नाम ही स्वयं में एक आकर्षण है। खारवन यानी खार का वन। गांव के बुजुर्गों के अनुसार इस गांव का नाम यहां के जंगल पर पड़ा है। गांव का नाम खार और वन दो शब्दों से मिलकर बना है। खार का अर्थ होता है खारी या झाड़ियों वाला जंगली क्षेत्र और वन जहां अत्यंत पेड़-पौधे हों। कहा जाता है कि यहां पर पहला काफी खारा क्षेत्र था और कुछ दूरी पर बह रही यमुना तक घना जंगल हुआ था।
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प्राचीन भाषा व बोलचाल में जंगल को शुद्ध हिंदी में वन कहा जाता था। इससे खारावन और फिर खारवन नाम हो गया। गांव के कुछ पुराने लोगों का कहना है कि यहां पर एक कुख्यात और अत्याचारी राजा होता था, जिससे खूंखार सिंह के नाम से जाना जाता था। बुजुर्गों के अनुसार खूंखार सिंह उस जंगल में आता जाता था और लोगों को भी वहीं ले जाकर प्रताड़ित करता था। इसके बाद इसे खूंखार का वन कहा जाने लगा। इसके बाद खूंखार वन और फिर खारवन नाम से जाना जाने लगा। जब आजादी की लड़ाई का दौर शुरू हुआ तो अन्य धर्म के लोग भी यहां आकर बसने लगे। 1947 में बंटवारे के बाद यहां से मुस्लिम लोग पलायन कर गए। यहां के सभी मुस्लिम चले गए और उनके परिवार का कोई सदस्य यहां नहीं रहा। इसके साथ उस समय पाकिस्तान से विस्थापित हिंदू, सिख यहां बस गए। संवाद
राजसी काल में हुआ सबसे ज्यादा विकास
गांव के 77 वर्षीय ओमप्रकाश का कहना है कि उन्हें करीब 200 वर्ष पहले तक के इतिहास के बारे में जानकारी है। इस गांव में सबसे ज्यादा विकास राजसी काल में हुआ था। यह छछरौली खंड के कलसिया रियासत का हिस्सा हुआ था। उस समय यह गांव मुस्लिम बहुल हुआ करता था। गांव में मुस्लिम आबादी काफी हुआ करती थी।
एक-दूसरे के सुख-दुख में होते हैं शरीक
राजकुमार ने बताया कि उनका गांव भाईचारे और सौहार्द का प्रतीक है। यहां पर भाईचारे और सामाजिक प्रेम की मिसाल देखने को मिलती है। गांव में चार गुरुद्वारे, चार बड़े मंदिर हैं। इसके साथ गांव में एक चर्च भी है। गुरुद्वारे में गुरबाणी, मंदिरों और चर्च में भी नियमित रूप से प्रार्थना होती है। लोगों को किसी से कोई वैर नहीं है और एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते हैं।
गांव में 22 वार्ड और 11,000 की आबादी
गांव के अनिल कुमार ने बताया कि इस गांव में आबादी करीब 11,000 है। इसके अलावा गांव के बाहरी क्षेत्र में प्रवासी भी रहते हैं। गांव में पंचायत के कुल 22 वार्ड हैं। गांव का खेतीहर रकबा करीब 52,000 एकड़ है। यहां के ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन रहा है। अब गांव के लोग परिवार चलाने के लिए स्वरोजगार व नौकरी कर रहे हैं।
पहले इसमें जुड़े थे कई गांव
ग्रामीण बंताराम ने बताया कि खारवन में पहले कई गांव लगा करते थे। कलसिया रिसायत के बड़े गांवों में शामिल इसकी राजधानी छछरौली हुआ करती थी। इसमें भगवानपुर, कृष्ण का माजरा, पार का माजरा, टपरियां गांव इसी पंचायत का हिस्सा हुआ करते थे। खारवन की आय व रोजगार का मुख्य साधन छछरौली का बाजार और राजधानी से कारोबार हुआ था।
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जगाधरी। जिले के सबसे बड़े गांव में शामिल खारवन स्वयं में कई कहानियां समेटे हुए हैं। इस गांव का इतिहास राजसी काल का बताया जाता है। गांव के पुराने लोगों का कहना है उन्हें कलसिया रियासत तक ज्ञात है, लेकिन इससे पहले के इतिहास में किसी को सही जानकारी नहीं है। खारवन जिले के छछरौली क्षेत्र का प्राचीन और बड़ा गांव माना जाता है।
यह शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी के निकट स्थित है और ऐतिहासिक रूप से पूर्ववर्ती कलसिया रियासत के प्रभाव क्षेत्र में आता था। छछरौली स्वयं कलसिया रियासत की राजधानी रही है, इसलिए आसपास के गांवों का विकास भी इसी रियासत के प्रशासन और कृषि व्यवस्था के अंतर्गत हुआ।
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इस गांव का नाम ही स्वयं में एक आकर्षण है। खारवन यानी खार का वन। गांव के बुजुर्गों के अनुसार इस गांव का नाम यहां के जंगल पर पड़ा है। गांव का नाम खार और वन दो शब्दों से मिलकर बना है। खार का अर्थ होता है खारी या झाड़ियों वाला जंगली क्षेत्र और वन जहां अत्यंत पेड़-पौधे हों। कहा जाता है कि यहां पर पहला काफी खारा क्षेत्र था और कुछ दूरी पर बह रही यमुना तक घना जंगल हुआ था।
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प्राचीन भाषा व बोलचाल में जंगल को शुद्ध हिंदी में वन कहा जाता था। इससे खारावन और फिर खारवन नाम हो गया। गांव के कुछ पुराने लोगों का कहना है कि यहां पर एक कुख्यात और अत्याचारी राजा होता था, जिससे खूंखार सिंह के नाम से जाना जाता था। बुजुर्गों के अनुसार खूंखार सिंह उस जंगल में आता जाता था और लोगों को भी वहीं ले जाकर प्रताड़ित करता था। इसके बाद इसे खूंखार का वन कहा जाने लगा। इसके बाद खूंखार वन और फिर खारवन नाम से जाना जाने लगा। जब आजादी की लड़ाई का दौर शुरू हुआ तो अन्य धर्म के लोग भी यहां आकर बसने लगे। 1947 में बंटवारे के बाद यहां से मुस्लिम लोग पलायन कर गए। यहां के सभी मुस्लिम चले गए और उनके परिवार का कोई सदस्य यहां नहीं रहा। इसके साथ उस समय पाकिस्तान से विस्थापित हिंदू, सिख यहां बस गए। संवाद
राजसी काल में हुआ सबसे ज्यादा विकास
गांव के 77 वर्षीय ओमप्रकाश का कहना है कि उन्हें करीब 200 वर्ष पहले तक के इतिहास के बारे में जानकारी है। इस गांव में सबसे ज्यादा विकास राजसी काल में हुआ था। यह छछरौली खंड के कलसिया रियासत का हिस्सा हुआ था। उस समय यह गांव मुस्लिम बहुल हुआ करता था। गांव में मुस्लिम आबादी काफी हुआ करती थी।
एक-दूसरे के सुख-दुख में होते हैं शरीक
राजकुमार ने बताया कि उनका गांव भाईचारे और सौहार्द का प्रतीक है। यहां पर भाईचारे और सामाजिक प्रेम की मिसाल देखने को मिलती है। गांव में चार गुरुद्वारे, चार बड़े मंदिर हैं। इसके साथ गांव में एक चर्च भी है। गुरुद्वारे में गुरबाणी, मंदिरों और चर्च में भी नियमित रूप से प्रार्थना होती है। लोगों को किसी से कोई वैर नहीं है और एक-दूसरे के सुख-दुख में शरीक होते हैं।
गांव में 22 वार्ड और 11,000 की आबादी
गांव के अनिल कुमार ने बताया कि इस गांव में आबादी करीब 11,000 है। इसके अलावा गांव के बाहरी क्षेत्र में प्रवासी भी रहते हैं। गांव में पंचायत के कुल 22 वार्ड हैं। गांव का खेतीहर रकबा करीब 52,000 एकड़ है। यहां के ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन रहा है। अब गांव के लोग परिवार चलाने के लिए स्वरोजगार व नौकरी कर रहे हैं।
पहले इसमें जुड़े थे कई गांव
ग्रामीण बंताराम ने बताया कि खारवन में पहले कई गांव लगा करते थे। कलसिया रिसायत के बड़े गांवों में शामिल इसकी राजधानी छछरौली हुआ करती थी। इसमें भगवानपुर, कृष्ण का माजरा, पार का माजरा, टपरियां गांव इसी पंचायत का हिस्सा हुआ करते थे। खारवन की आय व रोजगार का मुख्य साधन छछरौली का बाजार और राजधानी से कारोबार हुआ था।

गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद

गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद

गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद

गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद

गांव खारवन का स्वागत द्वार। संवाद