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कार्तिक अमावस्या पर मिला था भगवान महावीर को मोक्ष
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शांति धारा करते जैन धर्म के अनुयायी। संवाद
- फोटो : Yamuna Nagar
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिले के जैन मंदिरों में भगवान महावीर का मोक्ष कल्याणक दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया। समाज के वक्ताओं ने बताया कि कार्तिक अमावस्या के दिन भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
मुख्य कार्यक्रम रेस्ट हाउस रोड स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में हुआ। अध्यक्षता मंदिर संरक्षक आरके जैन व गिरीराज ने की। संचालन सचिव पुनीत गोल्डी जैन ने किया। प्रधान अजय जैन ने बताया कि जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी को कार्तिक अमावस्या को सुबह की बेला में मोक्ष हुआ था। प्रतिवर्ष दीपावली के दिन जैन धर्म में दीपमालिका सजाकर भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि जब महावीर पावा नगरी के मनोहर उद्यान में गए हुए थे, तब चतुर्थकाल पूरा होने में तीन वर्ष और आठ माह बाकी थे। तब कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्वाति नक्षत्र के दौरान महावीर स्वामी अपने सांसारिक जीवन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गए। उस समय इंद्रादि देवों ने आकर भगवान महावीर के शरीर की पूजा की और पूरी पावा नगरी को दीपकों से सजाकर प्रकाशयुक्त कर दिया, तभी से आज तक यही परंपरा जैन धर्म में चली आ रही है।
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संरक्षक सुभाष जैन ने कहा कि जैन धर्म में प्रतिवर्ष भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता है, उसी दिन शाम को श्री गौतम स्वामी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। तब देवताओं ने प्रकट होकर गंधकुटी की रचना की और गौतम स्वामी एवं कैवल्य ज्ञान की पूजा करके दीपोत्सव का महत्व बढ़ाया।
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यमुनानगर। जिले के जैन मंदिरों में भगवान महावीर का मोक्ष कल्याणक दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया। समाज के वक्ताओं ने बताया कि कार्तिक अमावस्या के दिन भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
मुख्य कार्यक्रम रेस्ट हाउस रोड स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में हुआ। अध्यक्षता मंदिर संरक्षक आरके जैन व गिरीराज ने की। संचालन सचिव पुनीत गोल्डी जैन ने किया। प्रधान अजय जैन ने बताया कि जैन धर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी को कार्तिक अमावस्या को सुबह की बेला में मोक्ष हुआ था। प्रतिवर्ष दीपावली के दिन जैन धर्म में दीपमालिका सजाकर भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता है।
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उन्होंने बताया कि जब महावीर पावा नगरी के मनोहर उद्यान में गए हुए थे, तब चतुर्थकाल पूरा होने में तीन वर्ष और आठ माह बाकी थे। तब कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्वाति नक्षत्र के दौरान महावीर स्वामी अपने सांसारिक जीवन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गए। उस समय इंद्रादि देवों ने आकर भगवान महावीर के शरीर की पूजा की और पूरी पावा नगरी को दीपकों से सजाकर प्रकाशयुक्त कर दिया, तभी से आज तक यही परंपरा जैन धर्म में चली आ रही है।
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संरक्षक सुभाष जैन ने कहा कि जैन धर्म में प्रतिवर्ष भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता है, उसी दिन शाम को श्री गौतम स्वामी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। तब देवताओं ने प्रकट होकर गंधकुटी की रचना की और गौतम स्वामी एवं कैवल्य ज्ञान की पूजा करके दीपोत्सव का महत्व बढ़ाया।